ग़ज़ल
ऐ हुस्न-ए-यार शर्म ये क्या इंक़लाब है
اے حسن یار شرم یہ کیا انقلاب ہے
यह ग़ज़ल इश्क़ के दर्द और उसकी गहराइयों को बयां करती है, जहाँ महबूब की उपस्थिति से अधिक उसका दिया हुआ दर्द प्रभावी साबित होता है। इसमें शायर ने तग़ाफ़ुल यानी उपेक्षा को आशिक़ की तड़प का हल न मानकर केवल सच्चे प्रेम के जोश को ही इसका असली जवाब माना है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
ऐ हुस्न-ए-यार शर्म ये क्या इंक़लाब है
तुझ से ज़ियादा दर्द तिरा कामयाब है
ऐ महबूब के हुस्न, शर्म करो कि यह कैसा उलटफेर है, जहाँ तुमसे भी ज़्यादा तुम्हारा दिया हुआ दर्द कामयाब साबित हुआ है।
2
आशिक़ की बे-दिली का तग़ाफ़ुल नहीं जवाब
उस का बस एक जोश-ए-मोहब्बत जवाब है
प्रेमी की बेदिली या उदासी का जवाब उपेक्षा या अनदेखी नहीं हो सकती, बल्कि उसका एकमात्र जवाब सिर्फ़ प्रेम का सच्चा जोश और उत्साह ही है।
3
तेरी इनायतें कि नहीं नज़्र-ए-जाँ क़ुबूल
तेरी नवाज़िशें कि ज़माना ख़राब है
यह आपकी कैसी कृपा है कि आपको मेरी जान की भेंट भी स्वीकार नहीं, और यह कैसी मेहरबानी है कि यह कहकर मना करते हैं कि ज़माना ख़राब है।
4
ऐ हुस्न अपनी हौसला-अफ़ज़ाइयाँ तो देख
माना कि चश्म-ए-शौक़ बहुत बे-हिजाब है
ऐ हुस्न, ज़रा खुद अपनी दी हुई हिम्मत और बढ़ावा भी तो देख; माना कि चाहने वाली नज़र बहुत बेबाक और बे-पर्दा है।
5
मैं इश्क़-ए-बे-नियाज़ हूँ तुम हुस्न-ए-बे-पनाह
मेरा जवाब है न तुम्हारा जवाब है
मैं बेपरवाह और बेनियाज़ इश्क़ हूँ और तुम असीम हुस्न हो; न मेरा कोई सानी है और न तुम्हारा कोई मुक़ाबला है।
6
मय-ख़ाना है उसी का ये दुनिया उसी की है
जिस तिश्ना-लब के हाथ में जाम-ए-शराब है
मयख़ाना और यह पूरी दुनिया उसी इंसान की है, जिस प्यासे के हाथ में शराब का प्याला है।
7
उस से दिल-ए-तबाह की रूदाद क्या कहूँ
जो ये न सुन सके कि ज़माना ख़राब है
मैं उस व्यक्ति को अपने तबाह दिल की दास्तान क्या सुनाऊँ, जो इतनी सी बात भी नहीं सुन सकता कि ज़माना ख़राब है।
8
ऐ मोहतसिब न फेंक मिरे मोहतसिब न फेंक
ज़ालिम शराब है अरे ज़ालिम शराब है
ऐ मोहतसिब, इसे मत फेंक, मेरे मोहतसिब इसे ज़मीन पर मत बहा। अरे ज़ालिम, देख तो सही कि यह शराब है!
9
अपने हुदूद से न बढ़े कोई इश्क़ में
जो ज़र्रा जिस जगह है वहीं आफ़्ताब है
इश्क़ में किसी को भी अपनी सीमा से आगे नहीं बढ़ना चाहिए, क्योंकि हर छोटा कण अपनी जगह पर सूरज की तरह महत्वपूर्ण होता है।
10
वो लाख सामने हों मगर इस का क्या इलाज
दिल मानता नहीं कि नज़र कामयाब है
भले ही महबूब आँखों के बिल्कुल सामने हों, लेकिन इसका क्या इलाज है कि दिल यह मानने को तैयार ही नहीं होता कि नज़र को उनका दीदार नसीब हो चुका है।
11
मेरी निगाह-ए-शौक़ भी कुछ कम नहीं मगर
फिर भी तिरा शबाब तिरा ही शबाब है
हालाँकि मेरी चाहत भरी निगाह भी किसी से कम नहीं है, फिर भी तुम्हारा यौवन और सौंदर्य अपनी मिसाल आप है।
12
मानूस-ए-ए'तिबार-ए-करम क्यूँ किया मुझे
अब हर ख़ता-ए-शौक़ इसी का जवाब है
आपने मुझे अपनी मेहरबानी और इनायत पर भरोसा करने का आदी क्यों बनाया? अब मेरी चाहत में होने वाली हर ख़ता दरअसल उसी भरोसे का जवाब है।
13
मैं उस का आईना हूँ वो है मेरा आईना
मेरी नज़र से उस की नज़र कामयाब है
मैं उसका आईना हूँ और वह मेरा आईना है; मेरी नज़र की वजह से ही उसकी नज़र सफल होती है।
14
तन्हाई-ए-फ़िराक़ के क़ुर्बान जाइए
मैं हूँ ख़याल-ए-यार है चश्म-ए-पुर-आब है
जुदाई के इस अकेलेपन पर क़ुरबान जाऊँ, जहाँ केवल मैं हूँ, महबूब की याद है और आँसुओं से भरी आँखें हैं।
15
सरमाया-ए-फ़िराक़ 'जिगर' आह कुछ न पूछ
अब जान है सो अपने लिए ख़ुद अज़ाब है
ऐ जिगर, जुदाई की कमाई या हासिल के बारे में मत पूछो; अब जो यह बची हुई जान है, वह खुद अपने ही लिए अज़ाब और मुसीबत बन गई है।
Comments · 0
Free — just your email. You'll come right back here.
No comments yet. Be the first.
