ऐ मोहतसिब न फेंक मिरे मोहतसिब न फेंक ज़ालिम शराब है अरे ज़ालिम शराब है

“O censor, do not spill it, my censor do not cast it away; Cruel one, it is wine—ah, cruel one, it is wine!”

— जिगर मुरादाबादी
अर्थ

ऐ मोहतसिब, इसे मत फेंक, मेरे मोहतसिब इसे ज़मीन पर मत बहा। अरे ज़ालिम, देख तो सही कि यह शराब है!

विस्तार

इस शे’र में शायर शहर के धर्म-रक्षक यानी मोहतसिब से बड़ी मिन्नत और शोख़ी के साथ कह रहा है कि वह उसकी शराब को ज़मीन पर बहाकर ज़ाया न करे। यहाँ 'ज़ालिम' लफ़्ज़ का दोहरा इस्तेमाल देखने लायक है—शायर या तो शराब फेंकने वाले मोहतसिब को ज़ालिम कह रहा है, या फिर शराब के मदहोश कर देने वाले असर की दुहाई दे रहा है। यह शे’र रूढ़िवादी पाबंदियों और मस्त-मौला आशिक़ों के बीच की उस मीठी तकरार को बड़ी ख़ूबसूरती से बयां करता है जो उर्दू शायरी की जान है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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