क्या उठाएगी सबा ख़ाक मिरी उस दर से ये क़यामत तो ख़ुद उन से भी उठाई न गई

“How could the morning breeze lift my dust from that threshold, when this calamity was more than even my beloved could raise?”

— जिगर मुरादाबादी
अर्थ

सुबह की हवा भला उस चौखट से मेरी ख़ाक क्या उठा पाएगी, यह आफ़त या क़यामत तो ख़ुद महबूब से भी उठाई न जा सकी।

विस्तार

यहाँ शायर ने 'क़यामत उठाने' के मुहावरे का बड़ा ख़ूबसूरत इस्तेमाल किया है, जिसके दो मायने हैं—एक भारी तूफ़ान खड़ा करना और दूसरा किसी असहनीय बोझ को उठाना। आशिक़ मिटकर महबूब की चौखट की ख़ाक बन चुका है, और उसकी यह वफ़ा व दर्द इतना भारी है कि ख़ुद माशूक़ भी इसे झेल या हटा नहीं सका। ऐसे में सुबह की नाज़ुक हवा यानी 'सबा' में इतनी ताक़त कहाँ कि वह इस असीम इश्क़ की निशानी को वहाँ से मिटा सके?

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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