ग़ज़ल

दास्तान-ए-ग़म-ए-दिल उन को सुनाई न गई

داستان غم دل ان کو سنائی نہ گئی
जिगर मुरादाबादी· Ghazal· 5 shers· radif: न गई

यह ग़ज़ल दिल के अनकहे दर्द और लाचारी की भावपूर्ण दास्तान बयां करती है, जहाँ चाहकर भी महबूब तक अपने दिल का हाल नहीं पहुँचाया जा सका। जुनून और दीवानगी के आलम में दुनिया की हर चीज़ भुला देने के बाद भी महबूब की अनमोल याद हमेशा दिल में ज़िंदा रहती है।

Source: rekhta · HI

गीत सुनें
लिपि व अर्थ
1
दास्तान-ए-ग़म-ए-दिल उन को सुनाई न गई बात बिगड़ी थी कुछ ऐसी कि बनाई न गई
दिल के रंज-ओ-ग़म की दास्तान उन्हें सुनाई न जा सकी, क्योंकि हालात इस कदर बिगड़ चुके थे कि लाख कोशिश के बावजूद बात सुधारी न जा सकी।
2
सब को हम भूल गए जोश-ए-जुनूँ में लेकिन इक तिरी याद थी ऐसी जो भुलाई न गई
दीवानगी और जुनून के आलम में हम सबको भूल गए, लेकिन तुम्हारी याद ऐसी थी जिसे किसी तरह भुलाया न जा सका।
3
इश्क़ पर कुछ न चला दीदा-ए-तर का क़ाबू उस ने जो आग लगा दी वो बुझाई न गई
इश्क़ पर रोती हुई आँखों का कोई बस न चल सका। प्यार ने जो आग लगाई, उसे आँसुओं से भी बुझाया न जा सका।
4
पड़ गया हुस्न-ए-रुख़-ए-यार का परतव जिस पर ख़ाक में मिल के भी इस दिल की सफ़ाई न गई
जिस दिल पर महबूब के चेहरे के हुस्न का अक्स पड़ गया, वह मिट्टी में मिलने के बाद भी अपनी पाकीज़गी और चमक नहीं खो सका।
5
क्या उठाएगी सबा ख़ाक मिरी उस दर से ये क़यामत तो ख़ुद उन से भी उठाई न गई
सुबह की हवा भला उस चौखट से मेरी ख़ाक क्या उठा पाएगी, यह आफ़त या क़यामत तो ख़ुद महबूब से भी उठाई न जा सकी।
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