इश्क़ पर कुछ न चला दीदा-ए-तर का क़ाबू उस ने जो आग लगा दी वो बुझाई न गई

“Over love, the weeping eye could hold no sway; the fire it set ablaze could never be quenched.”

— जिगर मुरादाबादी
अर्थ

इश्क़ पर रोती हुई आँखों का कोई बस न चल सका। प्यार ने जो आग लगाई, उसे आँसुओं से भी बुझाया न जा सका।

विस्तार

यहाँ शायर ने पानी और आग के ख़ूबसूरत विरोधाभास के ज़रिए मोहब्बत की बेबसी को बयां किया है। आम तौर पर पानी से आग बुझ जाती है, मगर अश्कों से भरी आँखें (दीदा-ए-तर) भी दिल में भड़की इश्क़ की लपटों को ठंडा नहीं कर सकीं। यह शेर हमें समझाता है कि इश्क़ का दर्द इतना गहरा और पुरअसर होता है कि तमाम उम्र के आँसू भी उसे बुझाने में नाकाम रहते हैं।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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