“Who knows what has befallen the folk of passion's madness—they recall neither the grace of dying, nor the art of living.”
कौन जाने दीवानों को क्या हो गया है, उन्हें न तो जीने का सलीक़ा याद रहा और न ही मरने का ढंग।
जिगर मुरादाबादी का यह शेर दीवानों और आशिक़ों की बेदिली पर एक गहरा अफ़सोस ज़ाहिर करता है। इश्क़ की रवायत में जूनून के तलबगार या तो पूरी शान से ज़िंदगी जीते थे या फिर मोहब्बत की ख़ातिर बा-वक़ार मौत गले लगाते थे। लेकिन आज का दौर ऐसा बेजान हो गया है कि दीवाने न तो जीने का सलीक़ा जानते हैं और न ही क़ुर्बानी देने का हुनर; वे बस एक अजीब सी बेमक़सद ख़ामोशी में खो गए हैं।
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