ग़ज़ल
दुनिया के सितम याद न अपनी ही वफ़ा याद
دنیا کے ستم یاد نہ اپنی ہی وفا یاد
यह ग़ज़ल प्रेम की उस चरम अवस्था को दर्शाती है जहाँ आशिक़ दुनिया के सितम, अपने शिकवे और अपनी वफ़ा तक भूल जाता है। इस मुकम्मल समर्पण और बेखुदी के आलम में उसके दिल में केवल और केवल मोहब्बत का एहसास ही बाक़ी रह जाता है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
दुनिया के सितम याद न अपनी ही वफ़ा याद
अब मुझ को नहीं कुछ भी मोहब्बत के सिवा याद
मुझे न तो दुनिया के ज़ुल्म याद हैं और न ही अपनी वफ़ा, अब मुझे मोहब्बत के सिवा कुछ भी याद नहीं है।
2
मैं शिकवा ब-लब था मुझे ये भी न रहा याद
शायद कि मिरे भूलने वाले ने किया याद
मेरे होंठों पर शिकायत थी मगर मुझे यह भी याद नहीं रहा; शायद मुझे भुला देने वाले ने आज मुझे याद कर लिया है।
3
छेड़ा था जिसे पहले-पहल तेरी नज़र ने
अब तक है वो इक नग़्मा-ए-बे-साज़-ओ-सदा याद
तुम्हारी नज़र ने पहली बार जिस तराने को छेड़ा था, बिना किसी साज़ और आवाज़ का वह नग़्मा मुझे आज भी याद है।
4
जब कोई हसीं होता है सरगर्म-ए-नवाज़िश
उस वक़्त वो कुछ और भी आते हैं सिवा याद
जब भी कोई सुंदर व्यक्ति मुझ पर मेहरबानी या प्यार बरसाता है, उस वक़्त मुझे अपने महबूब की याद और भी ज़्यादा आती है।
5
क्या जानिए क्या हो गया अरबाब-ए-जुनूँ को
मरने की अदा याद न जीने की अदा याद
कौन जाने दीवानों को क्या हो गया है, उन्हें न तो जीने का सलीक़ा याद रहा और न ही मरने का ढंग।
6
मुद्दत हुई इक हादसा-ए-इश्क़ को लेकिन
अब तक है तिरे दिल के धड़कने की सदा याद
इश्क़ के उस हादसे को बीते एक लंबा अरसा हो गया है, मगर मुझे आज भी तुम्हारे दिल के धड़कने की आवाज़ याद है।
7
हाँ हाँ तुझे क्या काम मिरी शिद्दत-ए-ग़म से
हाँ हाँ नहीं मुझ को तिरे दामन की हवा याद
हाँ, तुम्हें मेरे दुःख की तीव्रता से क्या लेना-देना है? और हाँ, मुझे भी अब तुम्हारे दामन की सुकून देने वाली हवा याद नहीं है।
8
मैं तर्क-ए-रह-ओ-रस्म-ए-जुनूँ कर ही चुका था
क्यूँ आ गई ऐसे में तिरी लग़्ज़िश-ए-पा याद
मैं दीवानगी के तौर-तरीक़े और रस्मों-रिवाज़ छोड़ ही चुका था, ऐसे में अचानक मुझे तुम्हारे लड़खड़ाते क़दमों की याद क्यों आ गई?
9
क्या लुत्फ़ कि मैं अपना पता आप बताऊँ
कीजे कोई भूली हुई ख़ास अपनी अदा याद
इसमें क्या मज़ा कि मैं ख़ुद ही आपको अपना पता बताऊँ, बेहतर होगा कि आप अपनी कोई भूली हुई ख़ास अदा याद करें।
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