चराग़-ए-दैर-ओ-काबा अल्लाह अल्लाह हवा की ज़िद पे जलते जा रहे हैं

“The lamps of both the temple and Kaaba—Lord be praised!—continue to burn, defying the obstinate wind.”

— जिगर मुरादाबादी
अर्थ

मंदिर और काबा के चिराग़, सुब्हानअल्लाह, तेज़ हवा की ज़िद के बावजूद लगातार जलते चले जा रहे हैं।

विस्तार

इस शेर में शायर ने मंदिर (दैर) और काबा दोनों के चराग़ों का ज़िक्र करके इंसानी अक़ीदे और रूहानी सच्चाई की एक साझी लौ दिखाई है। यहाँ 'ज़िद्दी हवा' ज़ुल्म, नफ़रत और मुश्किल हालात का प्रतीक है, जो इस रौशनी को हर हाल में बुझा देना चाहती है। फिर भी इन चराग़ों का सीना ताने जलते रहना एक अनोखी ताक़त और हैरत ('अल्लाह अल्लाह') को बयाँ करता है, जो यह भरोसा दिलाता है कि ज़माने की मुख़ालफ़त के बावजूद मोहब्बत और सच्चाई का नूर हमेशा क़ायम रहता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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