जब निगाहें उठ गईं अल्लाह-री मेराज-शौक़ देखता क्या हूँ वो जान-ए-इंतिज़ार आ ही गया

“The moment my eyes were raised—O Lord, the zenith of desire! And what do I behold? The very soul of my waiting has arrived at last.”

— जिगर मुरादाबादी
अर्थ

जैसे ही मेरी निगाहें उठीं, शौक़ की इंतहा तो देखिए कि सामने क्या देखता हूँ, जिसका मुझे बेसब्री से इंतज़ार था वह आख़िरकार आ ही गया।

विस्तार

ज़रा उस जादुई पल की कल्पना कीजिए, जब बरसों के इंतज़ार के बाद आपकी नज़र अचानक ऊपर उठती है और महबूब सामने खड़ा मिलता है। शायर ने इस लम्हे को 'मेराज-ए-शौक़' यानी चाहत की सबसे मुक़द्दस और बुलंद मंज़िल कहा है, जहाँ बेचैनी एक झटके में मुकम्मल सुकून बन जाती है। यह शेर उस ख़ूबसूरत हैरत और ख़ुशी का इज़हार है जब इंतज़ार का सबब बनकर जीने वाला शख़्स सचमुच आपकी आँखों के सामने आ जाए।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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