हाए ये हुस्न-ए-तसव्वुर का फ़रेब-ए-रंग-ओ-बू मैं ये समझा जैसे वो जान-ए-बहार आ ही गया

“Ah, this illusion of color and scent born of imagination's grace; I truly believed the very soul of spring had finally arrived.”

— जिगर मुरादाबादी
अर्थ

कल्पना की सुंदरता का यह रंग और सुगंध का भ्रम ऐसा था कि मुझे लगा जैसे बहार की जान (मेरा महबूब) सचमुच आ ही गया है।

विस्तार

इस शेर में तसव्वुर (कल्पना) के हसीन जादू और विरह की तड़प का बेहद प्यारा बयान है। शायर अपने महबूब की यादों में इतना डूब जाता है कि उसे आसपास रंगों और खुशबुओं का समां बंधा महसूस होता है, जैसे बहार की जान—यानी उसका महबूब—सचमुच लौट आया हो। लेकिन 'हाए' का दर्दनाक लफ़्ज़ फौरन यह अहसास दिलाता है कि यह सब दिल का एक मीठा सा धोखा था, जिसने पल भर को बहला कर फिर अकेला छोड़ दिया।

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