मिरे अश्क-ए-ख़ूँ की बहार है कि मुरक़्क़ा-ए-ग़म-ए-यार है मिरी शाइ'री भी निसार है मिरी चश्म-ए-सेहर-निगार पर

“Is this the bloom of my tears of blood, or an album of grief for the beloved? Even my poetry is sacrificed before my magic-painting eye.”

— जिगर मुरादाबादी
अर्थ

क्या यह मेरे ख़ूनी आँसुओं की बहार है या महबूब के ग़म की कोई तस्वीर? मेरी शायरी भी मेरी इस जादू जैसी चित्रकारी करने वाली आँख पर न्योछावर है।

विस्तार

इस शेर में शायर अपने ख़ून के आंसुओं को सिर्फ़ रोना नहीं, बल्कि महबूब के ग़म की एक सजीव और रंगीन तस्वीर (मुरक़्क़ा) मानता है। दर्द का यह नज़ारा इतना जादुई और ख़ूबसूरत है कि शायर को अपनी ही लिखी शायरी इसके आगे फीकी लगती है। वह कहता है कि लफ़्ज़ों का हुनर भी उसकी उन आंखों के तिलिस्म पर क़ुरबान है, जो अश्कों के ज़रिये ग़म की जीती-जागती तस्वीरें बना रही हैं।

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