बैठे हम हर बज़्म में लेकिन झाड़ के उट्ठे अपना दामन

“In every assembly we took our seat, yet rose dusting clean the hem of our robe.”

— जिगर मुरादाबादी
अर्थ

हम हर महफ़िल और सभा में बैठे, लेकिन जब भी वहां से उठे तो अपना दामन झाड़ कर यानी पूरी तरह बेदाग़ और अलग रहकर उठे।

विस्तार

यह शेर दुनियादारी के बीच रहते हुए भी अपने आत्मसम्मान और सादगी को बचाए रखने की ख़ूबसूरत मिसाल है। शायर कहता है कि वह महफ़िलों और समाज के हर रंग में शामिल तो हुआ, मगर कभी उनके छल-कपट या बुराइयों का असर खुद पर नहीं पड़ने दिया। 'दामन झाड़ कर उठना' इस बात का प्रतीक है कि इंसान दुनिया के मेले से गुज़रे ज़रूर, लेकिन अपनी रूह पर ज़रा भी दाग़ न लगने दे।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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