ग़ज़ल
मोहब्बत में ये क्या मक़ाम आ रहे हैं
محبت میں یہ کیا مقام آ رہے ہیں
यह ग़ज़ल प्रेम की उस विरोधाभासी और बेचैन स्थिति को दर्शाती है, जहाँ मंज़िल पा लेने के बाद भी सफ़र खत्म नहीं होता। इसमें महबूब के इंतज़ार की बेकरारी और दिल को दिलासा देने की मीठी तड़प को संजीदगी से बयां किया गया है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
मोहब्बत में ये क्या मक़ाम आ रहे हैं
कि मंज़िल पे हैं और चले जा रहे हैं
2
ये कह कह के हम दिल को बहला रहे हैं
वो अब चल चुके हैं वो अब आ रहे हैं
3
वो अज़-ख़ुद ही नादिम हुए जा रहे हैं
ख़ुदा जाने क्या क्या ख़याल आ रहे हैं
4
हमारे ही दिल से मज़े उन के पूछो
वो धोके जो दानिस्ता हम खा रहे हैं
5
जफ़ा करने वालों को क्या हो गया है
वफ़ा कर के भी हम तो शर्मा रहे हैं
6
वो आलम है अब यारो अग़्यार कैसे
हमीं अपने दुश्मन हुए जा रहे हैं
7
मिज़ाज-ए-गिरामी की हो ख़ैर या-रब
कई दिन से अक्सर वो याद आ रहे हैं
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