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ग़ज़ल

कबीर 151-160

کبیر ۱۵۱-۱۶۰
कबीर· Ghazal· 10 shers

कबीर के ये दोहे अभिमान से बचने और विनम्रता अपनाने की शिक्षा देते हैं। इनमें सत्संगति के गहन लाभों पर विशेष जोर दिया गया है, बताते हैं कि कैसे यह कलह, कल्पना और दुख को दूर करती है। सत्संगति बुद्धि, शांति और स्थायी सुख को बढ़ावा देती है, तथा इसे चंदन के समान सकारात्मक परिवर्तन लाने वाली बताया गया है।

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1
कबीरा गरब कीजिए , कबहूँ हँसिये कोयअजहूँ नाव समुद्र में , ना जाने का होय153
कबीरा, तुम शोक मत करो और न ही कभी किसी पर हँसना। इस समुद्र में नाव पर, यह नहीं पता कि क्या होगा।
2
कबीरा कलह अरु कल्पना , सतसंगति से जायदुख बासे भागा फिरै , सुख में रहै समाय154
कबीरा, कलह और कल्पना मात्र, सच्ची संगति से दूर हो जाते हैं। दुख हमेशा भागता रहता है, जबकि सुख हृदय में समाया रहता है।
3
कबीरा संगति साधु की , जित प्रीत कीजै जायदुर्गति दूर वहावति , देवी सुमति बनाय155
कबीरा संगति साधु की, जहाँ प्रेम किया जा सकता है, वहाँ से संकट दूर हो जाता है और देवी अच्छी बुद्धि प्रदान करती हैं।
4
कबीरा संगत साधु की , निष्फल कभी होयहोमी चन्दन बासना , नीम कहसी कोय156
कबीरा संगत साधु की, निष्फल कभी न होय। होमी चन्दन बासना, नीम न कहसी कोय। इसका अर्थ है कि कबीर कहते हैं कि संतों की संगति कभी व्यर्थ नहीं जाती; चंदन की सुगंध का कभी इनकार नहीं किया जा सकता।
5
को छूटौ इहिं जाल परि , कत फुरंग अकुलायज्यों-ज्यों सुरझि भजौ चहै , त्यों-त्यों उरझत जाय157
हे विदेशी! मैं इस जाल से कैसे छूटूँ? जैसे-जैसे मैं तुम्हें पूजने की इच्छा करता हूँ, वैसे-वैसे तुम दूर होती जाती हो।
6
कबीरा सोया क्या करे , उठि भजे भगवानजम जब घर ले जाएँगे , पड़ा रहेगा म्यान158
कबीरा सो रहा है, तो वह भगवान की पूजा नहीं करेगा। जब यम उसे घर ले जाएँगे, तो वह म्यान में ही पड़ा रहेगा।
7
काह भरोसा देह का , बिनस जात छिन मारहिंसाँस-साँस सुमिरन करो , और यतन कछु नाहिं159
शरीर का किस पर भरोसा है, जो पल भर में नष्ट हो जाएगा। हर साँस के साथ तेरा सुमिरन कर, और कोई और प्रयास नहीं है।
8
काल करे से आज कर , सबहि सात तुव साथकाल काल तू क्या करे काल काल के हाथ160
इसका शाब्दिक अर्थ है कि जो काम कल करना है, उसे आज कर दो, और हमेशा ईश्वर के साथ रहो। हे ईश्वर, समय के हाथ में तुम क्या करोगे, क्या करोगे।
9
काया काढ़ा काल घुन , जतन-जतन सो खायकाया बह्रा ईश बस , मर्म काहूँ पाय161
शरीर (काया) एक घड़ा है, जिसे समय (काल) और अन्य तत्व लगातार खाते रहते हैं। यह शरीर तो बस एक माध्यम है, और इसका सार या मर्म कहीं नहीं मिल पाता।
10
कहा कियो हम आय कर , कहा करेंगे पायइनके भये उतके , चाले मूल गवाय162
हमने कहा कि हम कहाँ आएं और कहाँ जाएँ। इनके होने से न उतके और मूल मार्ग ही गँवा दिया।
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