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अब सुब्ह शाम शायद गिर्ये पे रंग आवे रहता है कुछ झमकता ख़ूनाब चश्म-ए-तर में

Perhaps the colors will fall upon the morning and evening, There remains a faint glimmer in the tearful eyes.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

अब सुबह और शाम शायद मेरे रोने में कोई रंग आ जाए। मेरी नम आँखों में अब भी खून के आँसुओं की कुछ चमक बाकी है।

विस्तार

यह शेर उम्मीद और छिपी हुई खूबसूरती की बात करता है। शायर कहते हैं कि भले ही सब कुछ बेरंग लगे, फिर भी सुबह और शाम को शायद रंग आ जाए। असली चमक तो 'चश्मे-ए-तर' में है—वो गहराई, वो नमी। यह हमें याद दिलाता है कि सच्ची भावनाएं अक्सर उन जगहों पर होती हैं, जिन्हें हम तुरंत नोटिस नहीं करते।

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