ग़ज़ल

आए हैं 'मीर' काफ़िर हो कर ख़ुदा के घर में

आए हैं 'मीर' काफ़िर हो कर ख़ुदा के घर में

यह ग़ज़ल एक व्यंग्यात्मक और आत्म-जागरूक लहजे में लिखी गई है, जिसमें कवि 'मीर' अपने आप को ईश्वर के घर में काफ़िर बनकर आने का वर्णन करता है। इसमें प्रेम और जीवन के गहरे दर्द को दर्शाया गया है, जहाँ प्रेम की सुंदरता और दर्द की तीव्रता दोनों ही मन को विचलित करती हैं। यह मानव मन की जटिलता और आध्यात्मिक विसंगति पर एक चिंतन है।

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लिपि व अर्थ
1
आए हैं 'मीर' काफ़िर हो कर ख़ुदा के घर में पेशानी पर है क़श्क़ा ज़ुन्नार है कमर में
मीर आज खुदा के घर यानी मस्जिद में एक काफिर के रूप में आए हैं। उनके माथे पर तिलक लगा है और कमर में जनेऊ बंधा है, जो पारंपरिक सीमाओं को चुनौती देता है।
2
नाज़ुक बदन है कितना वो शोख़-चश्म दिलबर जान उस के तन के आगे आती नहीं नज़र में
उस चंचल आँखों वाले प्रियतम का शरीर कितना कोमल और नाजुक है। उनके बदन की इस नजाकत और चमक के सामने तो प्राण यानी रूह भी आंखों को दिखाई नहीं देती।
3
सीने में तीर उस के टूटे हैं बे-निहायत सुराख़ पड़ गए हैं सारे मिरे जिगर में
महबूब के अनगिनत तीर मेरे सीने के भीतर टूट गए हैं, जिससे मेरा पूरा जिगर सुराख़ों से भर गया है।
4
आइंदा शाम को हम रोया कुढ़ा करेंगे मुतलक़ असर न देखा नालीदन-ए-सहर में
अब से मैं शाम को रोया और दुखी हुआ करूँगा क्योंकि मैंने अपनी सुबह की आहों और पुकारों का कोई भी असर नहीं देखा।
5
बे-सुध पड़ा रहूँ हूँ उस मस्त-ए-नाज़ बिन मैं आता है होश मुझ को अब तो पहर पहर में
मैं अपनी उस नाज़ों-नख़रों वाली महबूबा के बिना बेसुध पड़ा रहता हूँ। अब मुझे होश भी बस कभी-कभी, पहरों के अंतराल पर ही आता है।
6
सीरत से गुफ़्तुगू है क्या मो'तबर है सूरत है एक सूखी लकड़ी जो बू न हो अगर में
असली महत्व चरित्र का है, बाहरी सुंदरता का नहीं। जैसे अगर (सुगंधित लकड़ी) बिना खुशबू के केवल एक सूखी लकड़ी है, वैसे ही बिना अच्छे स्वभाव के इंसान की सूरत का कोई मोल नहीं होता है।
7
हम-साया-ए-मुग़ाँ में मुद्दत से हूँ चुनाँचे इक शीरा-ख़ाने की है दीवार मेरे घर में
मैं लंबे समय से शराब बेचने वाले का पड़ोसी रहा हूँ, इसी कारण मेरे घर की एक दीवार असल में शराबखाने की ही दीवार है।
8
अब सुब्ह ओ शाम शायद गिर्ये पे रंग आवे रहता है कुछ झमकता ख़ूनाब चश्म-ए-तर में
अब सुबह और शाम शायद मेरे रोने में कोई रंग आ जाए। मेरी नम आँखों में अब भी खून के आँसुओं की कुछ चमक बाकी है।
9
आलम में आब-ओ-गिल के क्यूँकर निबाह होगा अस्बाब गिर पड़ा है सारा मिरा सफ़र में
पानी और मिट्टी की इस दुनिया में मेरा गुज़ारा कैसे होगा? मेरी यात्रा के दौरान मेरा सारा सामान और ज़रुरत की चीज़ें गिर गई हैं, और अब मैं खाली हाथ हूँ।
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