ग़ज़ल
हमारे आगे तिरा जब किसू ने नाम लिया
ہمارے آگے ترا جب کسو نے نام لیا
यह ग़ज़ल प्रेम की गहरी वेदना और प्रेमी के आहत हृदय की बेबसी को उजागर करती है। इसमें महबूब का नाम सुनते ही जाग उठने वाले दर्द और विरह के तीव्र अहसास को अत्यंत मार्मिक रूप से प्रस्तुत किया गया है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
हमारे आगे तिरा जब किसू ने नाम लिया
दिल-ए-सितम-ज़दा को हम ने थाम थाम लिया
जब भी किसी ने मेरे सामने तुम्हारा नाम लिया, तो मैंने अपने इस पीड़ित और सताए हुए दिल को बार-बार थामकर संभाला।
2
क़सम जो खाइए तो ताला-ए-ज़ुलेख़ा की
अज़ीज़-ए-मिस्र का भी साहब इक ग़ुलाम लिया
अगर क़सम खानी ही हो तो ज़ुलैख़ा की क़िस्मत की खाइए, जिसने मिस्र के हाकिम (अज़ीज़) के ग़ुलाम को भी अपना बना लिया।
3
ख़राब रहते थे मस्जिद के आगे मय-ख़ाने
निगाह-ए-मस्त ने साक़ी की इंतिक़ाम लिया
मस्जिद के सामने मयखाने वीरान और बदहाल पड़े रहते थे, लेकिन साक़ी की मदहोश नज़रों ने इसका बदला ले लिया।
4
वो कज-रविश न मिला रास्ते में मुझ से कभी
न सीधी तरह से उन ने मिरा सलाम लिया
वह टेढ़ी चाल चलने वाला महबूब कभी रास्ते में मुझसे नहीं मिला, और न ही उसने कभी सीधे तरीके से मेरा सलाम स्वीकार किया।
5
मज़ा दिखावेंगे बे-रहमी का तिरी सय्याद
गर इज़्तिराब-ए-असीरी ने ज़ेर-ए-दाम लिया
ऐ शिकारी, अगर जाल के नीचे क़ैद की बेचैनी और तड़प ने मुझे अपनी गिरफ़्त में ले लिया, तो हम तुम्हें तुम्हारी बे-रहमी का मज़ा चखाएँगे।
6
मिरे सलीक़े से मेरी निभी मोहब्बत में
तमाम उम्र मैं नाकामियों से काम लिया
मोहब्बत में मेरा निबाह सिर्फ़ मेरे सलीक़े और समझदारी के सहारे हुआ, और पूरी ज़िंदगी मैंने अपनी असफलताओं से ही काम चलाया।
7
अगरचे गोशा-गुज़ीं हूँ मैं शाइरों में 'मीर'
प मेरे शोर ने रू-ए-ज़मीं तमाम लिया
ऐ मीर, भले ही मैं शायरों में अलग-थलग और एकांत में रहता हूँ, लेकिन मेरी शायरी के शोर और शोहरत ने पूरी ज़मीन को घेर लिया है।
Comments · 0
Free — just your email. You'll come right back here.
No comments yet. Be the first.
