है तअ'ज्जुब ख़िज़्र को और आब-ए-हैवाँ की तलब और फिर उज़्लत-गुज़ीन-ए-दामन-ए-सहरा हैं आप

“Strange it is that Khizr should still crave the Water of Life, and stranger still that in the desert's skirts you dwell in seclusion.”

— नज़्म तबातबाई
अर्थ

यह आश्चर्य की बात है कि ख़िज़्र को अब भी आब-ए-हयात की चाह है, और फिर आप सहरा के दामन में एकांत अपनाए बैठे हैं।

विस्तार

हज़रत ख़िज़्र के बारे में मशहूर है कि उन्होंने 'आब-ए-हयात' (अमृत) पीकर अमरता पाई थी, इसलिए शायर हैरानी जताते हैं कि उन्हें अब भी उस ज़िंदगी बख़्शने वाले पानी की तलाश क्यों है! मज़ा यह भी है कि अमृत की चाह रखने वाला यह मुसाफ़िर महफ़िलों से दूर तपते सहरा की तन्हाई में जा बैठा है। यह शेर बड़ी ख़ूबसूरती से इंसान की उस कभी न मिटने वाली प्यास और अलगाव को दिखाता है, जो सब कुछ पा लेने के बाद भी बाक़ी रह जाती है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

ऑडियो

पाठUnavailable
हिंदी अर्थUnavailable
अंग्रेज़ी अर्थUnavailable
हिंदी विस्तारUnavailable
अंग्रेज़ी विस्तारUnavailable
Comments · 0

Free — just your email. You'll come right back here.

No comments yet. Be the first.