ग़ज़ल

कोई मय दे या न दे हम रिंद-ए-बे-पर्वा हैं आप

کوئی مے دے یا نہ دے ہم رند بے پروا ہیں آپ
नज़्म तबातबाई· Ghazal· 9 shers· radif: हैं आप

यह ग़ज़ल बेपरवाह मस्ती, आत्म-निर्भरता और सूफ़ी भावबोध को व्यक्त करती है। इसमें साक़ी, मय और ज्ञान के समस्त भेदों को मिटाकर स्वयं के भीतर ही परम-सत्य और आनंद की अनुभूति का गहरा दार्शनिक संदेश निहित है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
कोई मय दे या न दे हम रिंद-ए-बे-पर्वा हैं आप साक़िया अपनी बग़ल में शीशा-ए-सहबा हैं आप
कोई मुझे शराब दे या न दे, मैं खुद ही एक बेपरवाह शराबी हूँ; ऐ साक़ी, मैं शराब की बोतल अपनी ही बगल में दबाए रखता हूँ।
2
ग़ाफ़िल ओ होश्यार वो तिमसाल-ए-यक-आईना हैं वर्ता-ए-हैरत में नादाँ आप हैं दाना हैं आप
ग़ाफ़िल और होशियार दोनों एक ही आईने के प्रतिबिंब हैं; हैरानी के इस भंवर में नादान भी आप ही हैं और समझदार भी आप ही हैं।
3
क्यूँ रहे मेरी दुआ मिन्नत-कश-ए-बाल-ए-मलक नाला-ए-मस्ताना मेरे आसमाँ-पैमा हैं आप
मेरी दुआ फ़लक तक पहुँचने के लिए किसी फ़रिश्ते के परों की एहसानमंद क्यों रहे? मेरी दीवानी आहें और पुकार तो खुद ही आसमानों को पार करने की ताक़त रखती हैं।
4
है तअ'ज्जुब ख़िज़्र को और आब-ए-हैवाँ की तलब और फिर उज़्लत-गुज़ीन-ए-दामन-ए-सहरा हैं आप
यह आश्चर्य की बात है कि ख़िज़्र को अब भी आब-ए-हयात की चाह है, और फिर आप सहरा के दामन में एकांत अपनाए बैठे हैं।
5
मंज़िल-ए-तूल-ए-अमल दरपेश और मोहलत है कम राह किस से पूछिए हैरत में नक़्श-ए-पा हैं आप
सामने लंबी उम्मीदों की मंज़िल है जबकि वक़्त बहुत कम है; ऐसे में रास्ता किस से पूछा जाए जब ख़ुद क़दमों के निशान ही हैरत में पड़े हैं।
6
हक़ से तालिब दीद के हों हम बसीर ऐसे नहीं हम को जो कोतह-नज़र समझें वो ना-बीना हैं आप
हम इतने दिव्य दृष्टि वाले नहीं हैं कि ईश्वर के प्रत्यक्ष दर्शन का दावा करें, लेकिन जो हमें संकीर्ण दृष्टि वाला समझते हैं वे स्वयं दृष्टिहीन हैं।
7
गुल हमा-तन-ज़ख़्म हैं फिर भी हमा-तन-गोश हैं बे-असर कुछ नाला-हा-ए-बुलबुल-ए-शैदा हैं आप
गुलाब सिर से पाँव तक ज़ख्मों से भरा है फिर भी वह पूरी तरह सुनने में मग्न है, यानी आशिक़ बुलबुल की फ़रियादें पूरी तरह बेअसर नहीं हैं।
8
हिर्स से शिकवा करूँ क्या हाथ फैलाने का मैं कहती है वो अपने हाथों ख़ल्क़ में रुस्वा हैं आप
मैं लालच से दूसरों के आगे हाथ फैलाने की क्या शिकायत करूँ, क्योंकि वह खुद कहती है कि आप अपने ही कर्मों के कारण दुनिया में बदनाम हुए हैं।
9
हम से ऐ अहल-ए-तन'अउम मुँह छुपाना चाहिए दम भरा करते हैं हम और आइना-सीमा हैं आप
ऐ ऐशो-आराम में रहने वाले, आपको हमसे अपना चेहरा छिपाना चाहिए; क्योंकि हम हर घड़ी आहें भरते हैं और आपका चेहरा आईने की तरह साफ़ व चमकदार है (जो हमारी साँस से धुंधला हो सकता है)।
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