पहले जिगर पर आह का नाम न था निशाँ न था आख़िर-ए-कार ये हुआ आह तो है जिगर नहीं

“Once on the heart, of any sigh there was no mark or name; at last it came to pass: the sigh remains, the heart is gone.”

— नज़्म तबातबाई
अर्थ

शुरुआत में दिल पर आह का कोई नाम-ओ-निशान तक नहीं था, लेकिन अंत में यह हुआ कि अब आह तो बाकी है पर दिल ही नहीं रहा।

विस्तार

यह शेर दर्द और विरह के उस आलम को दिखाता है जहाँ ग़म इंसान को अंदर से ख़ाक कर देता है। शुरुआत में दिल इतना महफ़ूज़ था कि उस पर दर्द या किसी आह का नामोनिशान तक नहीं था। लेकिन वक़्त के साथ इश्क़ की आग ने दिल को इस कदर जला दिया कि अब सिर्फ़ तड़पती हुई आहें बची रह गई हैं, जबकि वो दिल ही फ़ना हो चुका है जहाँ से ये आहें उठती थीं।

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