ग़ज़ल

संग-ए-जफ़ा का ग़म नहीं दस्त-ए-तलब का डर नहीं

سنگ جفا کا غم نہیں دست طلب کا ڈر نہیں
नज़्म तबातबाई· Ghazal· 15 shers· radif: नहीं

यह ग़ज़ल स्वाभिमान, बेनियाज़ी और सामाजिक भटकाव पर एक गहरा चिंतन प्रस्तुत करती है। इसमें शायर ज़ुल्म और दुनियावी लालच से बेपरवाह होकर उस दिशाहीन समाज को आईना दिखाता है जो अपनी राह से भटक चुका है।

Source: rekhta · HI

गीत सुनें
लिपि व अर्थ
1
संग-ए-जफ़ा का ग़म नहीं दस्त-ए-तलब का डर नहीं अपना है उस पर आशियाँ नख़्ल जो बारवर नहीं
मुझे न तो ज़ुल्म के पत्थरों का कोई दुख है और न ही किसी तलबगार हाथ का कोई डर, क्योंकि मेरा घोंसला उस पेड़ पर बना है जो फलदार नहीं है।
2
सुनते हो अहल-ए-क़ाफ़िला मैं कोई राहबर नहीं देख रहा हूँ तुम में से एक भी राह पर नहीं
ऐ क़ाफ़िले के लोगो सुनो, मैं कोई मार्गदर्शक या राह दिखाने वाला नहीं हूँ; फिर भी मैं देख रहा हूँ कि तुममें से कोई भी सही रास्ते पर नहीं चल रहा है।
3
मौत का घर है आसमाँ इस से कहीं मफ़र नहीं निकलें तो कोई दर नहीं भागें तो रहगुज़र नहीं
आसमान मौत का घर है और इससे बच निकलने का कोई ठिकाना नहीं है। बाहर निकलने के लिए न तो कोई दरवाज़ा है और न ही भागने के लिए कोई रास्ता।
4
पहले जिगर पर आह का नाम न था निशाँ न था आख़िर-ए-कार ये हुआ आह तो है जिगर नहीं
शुरुआत में दिल पर आह का कोई नाम-ओ-निशान तक नहीं था, लेकिन अंत में यह हुआ कि अब आह तो बाकी है पर दिल ही नहीं रहा।
5
सुब्ह-ए-अज़ल से ता-अबद क़िस्सा न होगा ये तमाम जौर-ए-फ़लक की दास्ताँ ऐसी भी मुख़्तसर नहीं
सृष्टि के आरंभ से लेकर अंत तक भी यह कहानी समाप्त नहीं होगी। आसमान (भाग्य) के ज़ुल्मों की दास्तान इतनी भी छोटी नहीं है।
6
बर्ग-ए-ख़िज़ाँ-रसीदा हूँ छेड़ न मुझ को ऐ नसीम ज़ौक़ फ़ुग़ाँ का है मुझे शिक्वा-ए-अब्र-ए-तर नहीं
मैं पतझड़ का सताया हुआ एक सूखा पत्ता हूँ, ऐ सुबह की हवा मुझे मत छेड़; मुझे तो बस विलाप और आहें भरने का शौक है, बरसते बादलों से मुझे कोई शिकायत नहीं है।
7
मुंकिर-ए-हश्र है किधर देखे तू आँख खोल कर हश्र की जो ख़बर न दे ऐसी कोई सहर नहीं
क़यामत का इनकार करने वाला कहाँ है? वह अपनी आँखें खोलकर देखे कि ऐसी कोई सुबह नहीं होती जो क़यामत की ख़बर न देती हो।
8
शबनम ओ गुल को देख कर वज्द न आए किस तरह ख़ंदा बे-सबब नहीं गिर्या बे-असर नहीं
ओस और फूल को देखकर कोई मुग्ध या बेखुद कैसे न हो जाए? फूल का मुस्कुराना बिना किसी वजह के नहीं है और ओस के आँसू बेअसर नहीं हैं।
9
तेरे फ़क़ीर का ग़ुरूर ताजवरों से है सिवा तर्फ़-ए-कुलह में दे शिकन उस को ये दर्द-ए-सर नहीं
तेरे दर के फ़क़ीर का स्वाभिमान बादशाहों से भी कहीं अधिक है, और उसे अपनी शान दिखाने के लिए ताज या टोपी तिरछी करने का कोई झंझट नहीं रहता।
10
कोशक ओ क़स्र ओ बाम-ओ-दर तू ने बिना किए तो क्या हैफ़ है ख़ानुमाँ-ख़राब दिल में किसी के घेर नहीं
अगर तुमने महल, अट्टालिकाएँ, छतें और ऊँचे दरवाज़े बना भी लिए तो क्या हुआ? अफ़सोस की बात है, ऐ उजड़े हुए इंसान, कि तुम किसी के दिल में अपनी कोई जगह नहीं बना सके।
11
नाला-कशी रक़ीब से मेरी तरह मुहाल है दिल नहीं हौसला नहीं ज़ोहरा नहीं जिगर नहीं
रक़ीब (प्रतिद्वंद्वी) के लिए मेरी तरह आहें भरना या विलाप करना असंभव है। उसके पास न तो दिल है, न हौसला, न हिम्मत और न ही जिगर।
12
शातिर-ए-पीर-ए-आसमाँ वाह-री तेरी दस्तबुर्द ख़ुसरव ओ कैक़िबाद की तेग़ नहीं कमर नहीं
हे चालबाज़ बूढ़े आसमान! तेरी लूटमार का क्या कहना, ख़ुसरव और कैक़िबाद जैसे प्रतापी बादशाहों की न तो तलवार बची और न ही कमर का कोई नाम-ओ-निशान रहा।
13
शान करीम की ये है हाँ से हो पेशतर अता लुत्फ़ अता का क्या हो जब हाँ से हो पेशतर नहीं
सच्चे उदार दाता की शान यही है कि वह माँगने या 'हाँ' कहने से पहले ही अता कर दे; उस दान या मेहरबानी का क्या आनंद जो माँगने से पहले ही हासिल न हो।
14
लाख वो बे-रुख़ी करे लाख वो कज-रवी करे कुछ तो मलाल इस का हो दिल को मिरे मगर नहीं
वह चाहे कितनी भी बेरुखी दिखाए और कितना भी गलत व्यवहार करे, मेरे दिल को इसका थोड़ा तो दुख होना चाहिए था, लेकिन बिल्कुल नहीं है।
15
सुन के बुरा न मानिए सच को न झूट जानिए ज़िक्र है कुछ गिला नहीं बात है नेश्तर नहीं
यह सुनकर बुरा मत मानिए और सच को झूठ मत समझिए। यह महज़ एक ज़िक्र है कोई शिकायत नहीं, बस एक बात है कोई चुभने वाला नेश्तर नहीं।
Comments · 0

Free — just your email. You'll come right back here.

No comments yet. Be the first.

संग-ए-जफ़ा का ग़म नहीं दस्त-ए-तलब का डर नहीं | Sukhan AI