“O preacher, this debate with the mad / Is a blow to reason itself—tell me, wasn't that well said?”
ऐ नसीहत देने वाले, दीवानों और पागलों से बहस करना खुद बुद्धि की तौहीन है; बताओ, क्या मैंने यह बात बिल्कुल सही नहीं कही?
शायर यहाँ नसीहत देने वाले नासेह पर चुटकी लेते हुए कहता है कि इश्क़ में डूबे दीवानों को दलीलें देना सरासर बेवकूफ़ी है। जो लोग दुनियादारी की समझ से परे निकल चुके हों, उनके आगे अक़्ल बघारना समझदारी नहीं बल्कि ख़ुद अक़्ल की तौहीन है। शेर के आख़िर में शायर का एक शोख़ अंदाज़ झलकता है, जैसे मुस्कुराकर कह रहा हो कि बताओ, मैंने कैसी सटीक और खरी बात कह दी!
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