ग़ज़ल

सुब्हा है ज़ुन्नार क्यूँ कैसी कही

سبحہ ہے زنار کیوں کیسی کہی
नज़्म तबातबाई· Ghazal· 13 shers· radif: क्यूँ कैसी कही

यह ग़ज़ल पाखंडी धर्मगुरुओं और रूढ़िवादी मान्यताओं पर तीखा व्यंग्य करती है। इसमें तस्बीह और ज़ुन्नार जैसे प्रतीकों के माध्यम से ज़ाहिद के दोगलेपन पर सवाल उठाए गए हैं, जिसका समग्र लहज़ा चुटीला और विद्रोही है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
सुब्हा है ज़ुन्नार क्यूँ कैसी कही ज़ाहिद-ए-अय्यार क्यूँ कैसी कही
मैंने तुम्हारी तसबीह को ज़ुन्नार (जनेऊ) कह दिया, तो कहो कैसी रही? ऐ धूर्त तपस्वी, बताओ मैंने कैसी बात कही?
2
कट गए अग़्यार क्यूँ कैसी कही छा गई हर बार क्यूँ कैसी कही
ग़ैर और विरोधी क्यों मात खा गए, वाह क्या खूब बात कही; और वह हर बार सब पर कैसे छा गई, क्या कमाल की बात कही!
3
हैं ये सब इक़रार झूटे या नहीं कीजिए इक़रार क्यूँ कैसी कही
शायर पूछता है कि क्या ये सारे वादे झूठे हैं या नहीं, फिर खुद ही कहता है कि भला आप यह बात क्यों स्वीकार करेंगे, मैंने भी यह कैसी बात कह दी।
4
रूठने से आप का मतलब ये है इस को आए प्यार क्यूँ कैसी कही
क्या आपके रूठने का मतलब यह है कि मुझे आपसे प्यार क्यों आए? यह आपने कैसी अजीब बात कह दी!
5
कह दिया मैं ने सहर है झूट-मूट हो गए बेदार क्यूँ कैसी कही
मैंने तो बस यूँ ही झूठ-मूठ कह दिया था कि सुबह हो गई है; आप जाग क्यों गए, बताइए कैसी रही मेरी बात!
6
एक तो कहते हैं सदहा भपतियाँ और फिर इसरार क्यूँ कैसी कही
एक तो वे मुझ पर सैकड़ों फब्तियां कसते हैं, और फिर ज़िद करके पूछते हैं कि बताओ, कैसी कही?
7
नासेहा ये बहस दीवानों के साथ अक़्ल की है मार क्यूँ कैसी कही
ऐ नसीहत देने वाले, दीवानों और पागलों से बहस करना खुद बुद्धि की तौहीन है; बताओ, क्या मैंने यह बात बिल्कुल सही नहीं कही?
8
या ख़फ़ा थे या ज़रा सी बात पर हो गई बौछार क्यूँ कैसी कही
क्या आप पहले से ही नाराज़ थे, या फिर ज़रा सी बात पर कड़वे वचनों और सवालों की ऐसी बौछार क्यों शुरू हो गई?
9
मुझ से बैअत कर ले तू भी वाइज़ा हाथ लाना यार क्यूँ कैसी कही
ऐ उपदेशक, तू भी मेरे हाथ पर बैअत कर ले (मेरा शिष्य बन जा); अपना हाथ आगे बढ़ा दोस्त, बता यह बात तुझे कैसी लगी?
10
सुर्मा दे कर दिल के लेने का है क़स्द आँख तो कर चार क्यूँ कैसी कही
आँखों में सुरमा लगाकर तुम्हारा इरादा दिल चुराने का है, तो ज़रा मुझसे नज़रें मिलाकर तो देखो, कहो यह बात कैसी रही?
11
जान दे दे चल के दर पर यार के ओ दिल-ए-बीमार क्यूँ कैसी कही
जाकर महबूब की चौखट पर अपनी जान दे दे; ऐ बीमार दिल, बता यह विचार तुझे कैसा लगा?
12
क्या ही बिगड़े हो पत्ते की बात पर हो गए बेज़ार क्यूँ कैसी कही
आप एक काम की और सच्ची बात पर इस कदर नाराज़ हो गए हैं; आप यूँ बेज़ार क्यों हो गए, क्या मेरी बात आपको इतनी चुभ गई?
13
अब तो 'हैदर' और ही कुछ रंग हैं मानता हूँ यार क्यूँ कैसी कही
हे हैदर, अब तो हालात का रंग ही कुछ और हो चुका है; मैं तुम्हारी बात मानता हूँ दोस्त, तो बताओ मैंने कैसी बात कही?
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