ये आह-ए-बे-असर क्या हो ये नख़्ल-ए-बे-समर क्या हो न हो जब दर्द ही यारब तो दिल क्या हो जिगर क्या हो

“What good an unavailing sigh, what worth a barren tree? When pain itself is missing, O Lord, what use can heart or spirit be?”

— नज़्म तबातबाई
अर्थ

बेअसर आह और फलहीन पेड़ का क्या फायदा? हे ईश्वर, जब दिल में दर्द ही न हो, तो फिर दिल और जिगर का क्या मोल या अर्थ रह जाता है।

विस्तार

शायर यहाँ एक बेअसर आह की तुलना एक ऐसे सूखे और बे-फल पेड़ से कर रहे हैं, जिसका कोई हासिल नहीं होता। उर्दू शायरी की परंपरा में 'दर्द' केवल दुख नहीं, बल्कि इंसान के संवेदनशील और ज़िंदा होने की सबसे बड़ी निशानी है। शायर का मानना है कि अगर सीने में किसी के लिए हमदर्दी या इश्क़ की तड़प ही न हो, तो फिर दिल और जिगर का होना महज़ बेमानी है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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