ग़ज़ल
ये आह-ए-बे-असर क्या हो ये नख़्ल-ए-बे-समर क्या हो
یہ آہ بے اثر کیا ہو یہ نخل بے ثمر کیا ہو
यह ग़ज़ल प्रेम, विरह और हृदय की वेदना की सार्थकता पर केंद्रित है। शायर का मानना है कि दर्द के बिना दिल और बेअसर आहों का कोई मोल नहीं होता, जबकि महबूब का दीदार और मिलन की उम्मीद जीवन को उत्सव बना देती है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
ये आह-ए-बे-असर क्या हो ये नख़्ल-ए-बे-समर क्या हो
न हो जब दर्द ही यारब तो दिल क्या हो जिगर क्या हो
बेअसर आह और फलहीन पेड़ का क्या फायदा? हे ईश्वर, जब दिल में दर्द ही न हो, तो फिर दिल और जिगर का क्या मोल या अर्थ रह जाता है।
2
बग़ल-गीर आरज़ू से हैं मुरादें आरज़ू मुझ से
यहाँ इस वक़्त तो इक ईद है तुम जल्वा-गर क्या हो
मेरी मुरादें मेरी आरज़ुओं से गले मिल रही हैं और आरज़ू मुझसे; यहाँ इस वक़्त ईद जैसा माहौल है क्योंकि तुम्हारा दीदार हो गया है।
3
मुक़द्दर में ये लिक्खा है कटेगी उम्र मर-मर कर
अभी से मर गए हम देखिए अब उम्र भर क्या हो
मेरी किस्मत में यही लिखा है कि पूरी ज़िंदगी तिल-तिल कर मरे बिना नहीं कटेगी; शुरुआत में ही हमारा यह हाल हो गया है, अब देखिए आगे पूरी ज़िंदगी क्या होता है।
4
मुरव्वत से हो बेगाना वफ़ा से दूर हो कोसों
ये सच है नाज़नीं हो ख़ूबसूरत हो मगर क्या हो
तुम मुरव्वत और हमदर्दी से अनजान हो और वफ़ादारी से कोसों दूर हो; यह सच है कि तुम नाज़ुक और ख़ूबसूरत हो, मगर उसका क्या फ़ायदा?
5
लगा कर ज़ख़्म में टाँके क़ज़ा तेरी न आ जाए
जो वो सफ़्फ़ाक सुन पाए बता ऐ चारा-गर क्या हो
ऐ हकीम, कहीं मेरे ज़ख़्म सिलने के जुर्म में तुम्हारी ही मौत न आ जाए; ज़रा सोचो कि अगर उस ज़ालिम महबूब को इसका पता चल गया, तो क्या होगा?
6
क़यामत के बखेड़े पड़ गए आते ही दुनिया में
ये माना हम ने मर जाना तो मुमकिन है मगर क्या हो
दुनिया में आते ही हम क़यामत जैसी अनगिनत मुश्किलों और बखेड़ों में घिर गए। हम यह मानते हैं कि मौत मुमकिन है, लेकिन सवाल यह है कि उसके बाद भी क्या होगा?
7
कहा मैं ने कि 'नज़्म'-ए-मुब्तला मरता है हसरत में
कहा उस ने अगर मर जाए तो मेरा ज़रर क्या हो
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