“The tumult of Doomsday broke upon us the moment we arrived in this world; granted, death is entirely possible, but what will come of it, what then?”
दुनिया में आते ही हम क़यामत जैसी अनगिनत मुश्किलों और बखेड़ों में घिर गए। हम यह मानते हैं कि मौत मुमकिन है, लेकिन सवाल यह है कि उसके बाद भी क्या होगा?
शायर यहाँ ज़िन्दगी की जद्दोजहद और उलझनों पर एक तल्ख़ मगर ख़ूबसूरत तंज़ कर रहे हैं कि दुनिया में क़दम रखते ही मुसीबतों का बवंडर शुरू हो गया। हम अक्सर सोचते हैं कि मौत इन सब झमेलों से एक आसान छुटकारा है, लेकिन दूसरा मिसरा एक गहरा सवाल खड़ा करता है कि क्या सचमुच मरने से सब ठीक हो जाएगा? यह शे'र वजूद की उस बेबसी को छूता है जहाँ जीना एक मुसलसल इम्तिहान है और मौत भी किसी पक्के सुकून की गारंटी नहीं देती।
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