“Ever since your verse has won renown, O Vali, / From Arabia unto Persia, all yearn for your poetry.”
ऐ वली! जब से तुम्हारी शायरी मशहूर हुई है, अरब से लेकर अज़म (ग़ैर-अरब/फ़ारस) तक हर कोई तुम्हारी शायरी का मुश्ताक़ और दीवाना हो गया है।
इस शेर में वली दकनी बड़े ही नाज़ और फ़ख़्र के साथ अपनी शायरी के जादू का बखान कर रहे हैं, जिसे क्लासिकी शायरी में 'ता'अल्ली' कहा जाता है। वे कहते हैं कि जब से उनके कलाम की धूम मची है, अरब से लेकर अजम यानी फ़ारस तक, हर कोई उनकी आवाज़ सुनने को बेताब है। यह दरअस्ल एक शायर का अपने हुनर पर खूबसूरत यक़ीन है, जो बताता है कि दिल से निकली सच्ची बात हर सरहद को पार कर जाती है।
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