ग़ज़ल
जब तुझ अरक़ के वस्फ़ में जारी क़लम हुआ
جب تجھ عرق کے وصف میں جاری قلم ہوا
यह ग़ज़ल महबूब के अनुपम सौंदर्य और प्रेम की पावन निष्ठा का गुणगान करती है। इसमें शायर ने महबूब के रूप-लावण्य की प्रशंसा को शायरी के लिए अनमोल बताते हुए प्रेम के मार्ग पर अडिग रहने की भावना को व्यक्त किया है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
जब तुझ अरक़ के वस्फ़ में जारी क़लम हुआ
आलम में उस का नाँव जवाहर-रक़म हुआ
जब तुम्हारे पसीने की प्रशंसा लिखने में क़लम चली, तो पूरी दुनिया में उसका नाम 'जवाहरात लिखने वाली' पड़ गया।
2
नुक़्ते पे तेरे ख़ाल के बाँधा है जिन ने दिल
वो दाएरे में इश्क़ के साबित-क़दम हुआ
जिसने अपने दिल को तुम्हारे तिल के बिंदु से बाँध लिया है, वह प्रेम के दायरे में दृढ़ और अडिग हो गया है।
3
तुझ फ़ितरत-ए-बुलंद की ख़ूबी कूँ लिख क़लम
मशहूर जग के बीच अतारद-रक़म हुआ
तुम्हारी उच्च प्रकृति की खूबियों को लिखकर मेरा क़लम पूरे संसार में अतारुद (बुध ग्रह) जैसा लेखक बनकर प्रसिद्ध हो गया।
4
ताक़त नहीं कि हश्र में होवे वो दाद-ख़्वाह
जिस बे-गुनह पे तेरी निगह सूँ सितम हुआ
जिस निर्दोष व्यक्ति पर तुम्हारी निगाहों से ज़ुल्म हुआ है, उसमें क़यामत के दिन भी इंसाफ़ माँगने की ताक़त नहीं बची है।
5
बे-मिन्नत-ए-शराब हूँ सरशार-ए-इम्बिसात
तुझ नैन का ख़याल मुझे जाम-ए-जम हुआ
शराब के किसी एहसान के बिना ही मैं अत्यधिक आनंद से सराबोर हूँ; तुम्हारी आँखों का ख़याल ही मेरे लिए जामे-जम (जादुई प्याला) बन गया है।
6
जिन ने बयाँ लिखा है मिरे रंग-ए-ज़र्द का
उस कूँ ख़िताब ग़ैब सूँ ज़र्रीं-रक़म हुआ
जिस किसी ने मेरे पीले पड़े चेहरे के रंग का हाल लिखा, उसे ग़ैब (अदृश्य संसार) से 'सुनहरे अक्षरों वाला' (ज़र्रीं-रक़म) का ख़िताब मिला।
7
शोहरत हुई है जब से तिरे शेर की 'वली'
मुश्ताक़ तुझ सुख़न का अरब ता अजम हुआ
ऐ वली! जब से तुम्हारी शायरी मशहूर हुई है, अरब से लेकर अज़म (ग़ैर-अरब/फ़ारस) तक हर कोई तुम्हारी शायरी का मुश्ताक़ और दीवाना हो गया है।
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