ग़ज़ल

कमर उस दिलरुबा की दिलरुबा है

کمر اس دل ربا کی دل ربا ہے
वली दकनी· Ghazal· 7 shers· radif: है

यह ग़ज़ल महबूब के अनुपम सौंदर्य, नज़ाकत और दिलकश अदाओं की मधुर प्रशंसा करती है। शायर ने माशूक़ के आकर्षण को केवल सांसारिक न मानकर उसे गहरे रूहानी और ईश्वरीय सौंदर्य का दर्पण बताया है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
कमर उस दिलरुबा की दिलरुबा है निगह उस ख़ुश-अदा की ख़ुश-अदा है
उस दिलरुबा (प्रेमिका) की कमर दिल को मोह लेने वाली है, और उस सुंदर अदाओं वाली की नज़र भी बेहद दिलकश है।
2
सजन के हुस्न कूँ टुक फ़िक्र सूँ देख कि ये आईना-ए-मअ'नी-नुमा है
प्रियतम के सौंदर्य को ज़रा ध्यान और विचार से देखो, क्योंकि यह गहरे अर्थों को दर्शाने वाला आईना है।
3
ये ख़त है जौहर-ए-आईना-राज़ इसे मुश्क-ए-ख़ुतन कहना बजा है
चेहरे का यह नया ख़त (बारीक रोएँ) रहस्यों के आईने का जौहर है, और इसे खु़तन की कस्तूरी कहना पूरी तरह से उचित है।
4
हुआ मालूम तुझ ज़ुल्फ़ाँ सूँ ऐ शोख़ कि शाह-ए-हुस्न पर ज़िल्ल-ए-हुमा है
ऐ शोख़ महबूब, तुम्हारी ज़ुल्फ़ों को देखकर यह मालूम हुआ कि हुस्न के बादशाह पर हुमा परिंदे का मुबारक साया है।
5
न होवे कोहकन क्यूँ आ के आशिक़ जो वो शीरीं-अदा गुलगूँ-क़बा है
फ़रहाद (कोहकन) भला आकर आशिक़ क्यों न बने, जब वह महबूब शीरीं जैसी मीठी अदाओं वाला और गुलाबी लिबास पहने हुए है।
6
न पूछो आह-ओ-ज़ारी की हक़ीक़त अज़ीज़ाँ आशिक़ी का मुक़तज़ा है
मेरी आहों और रोने की हक़ीक़त मत पूछो; ऐ प्यारे दोस्तों, यह तो आशिक़ी और मोहब्बत का स्वाभाविक तक़ाज़ा है।
7
'वली' कूँ मत मलामत कर ऐ वाइज़ मलामत आशिक़ों पर कब रवा है
ऐ नसीहत देने वाले (वाइज़), वली को बुरा-भला मत कह और उस पर दोष मत लगा; आशिक़ों को मलामत करना कब जायज़ रहा है?
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