हर सहर शोख़ की निगह की शराब
मुझ अँखाँ का ख़ुमार खोती है
“Each dawn, the wine of the playful beloved's glance / Dispels the lingering languor from my eyes.”
— वली दकनी
अर्थ
हर सुबह महबूब की चंचल निगाहों की शराब मेरी आँखों का नशा और खुमार दूर कर देती है।
विस्तार
सोचिए कि सुबह की सुस्ती और भारीपन दिलबर की एक शोख़ नज़र से कैसे पल भर में काफूर हो जाता है। यहाँ शायर महबूब की नज़र को एक ख़ास शराब कह रहा है, जो होश उड़ाने के बजाय रात भर की नींद और ख़ुमार को मिटाकर ताज़गी बख़्शती है। यह शेर उस प्यारे एहसास का जश्न है, जहाँ महबूब का दीदार ही दिन की सबसे हसीन शुरुआत बन जाता है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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