ग़ज़ल
मुफ़्लिसी सब बहार खोती है
مفلسی سب بہار کھوتی ہے
यह ग़ज़ल मुफ़लिसी की कड़वी हक़ीक़त को उजागर करती है, जो इंसान से ज़िंदगी की सारी रौनक़ और उसका आत्म-सम्मान छीन लेती है। इसके साथ ही, इसमें महबूब की दिलकश ज़ुल्फ़ों से पैदा होने वाली दिली बेचैनी और इश्क़ की तड़प को भी बयां किया गया है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
मुफ़्लिसी सब बहार खोती है
मर्द का ए'तिबार खोती है
गरीबी जीवन की सारी खुशियों और रौनक को मिटा देती है, और इंसान का भरोसा व मान-सम्मान भी छीन लेती है।
2
क्यूँके हासिल हो मुज को जमइय्यत
ज़ुल्फ़ तेरी क़रार खोती है
मुझे दिल का सुकून कैसे हासिल हो सकता है, जब तुम्हारी बिखरी हुई ज़ुल्फ़ें मेरा सारा चैन छीन लेती हैं।
3
हर सहर शोख़ की निगह की शराब
मुझ अँखाँ का ख़ुमार खोती है
हर सुबह महबूब की चंचल निगाहों की शराब मेरी आँखों का नशा और खुमार दूर कर देती है।
4
क्यूँके मिलना सनम का तर्क करूँ
दिलबरी इख़्तियार खोती है
मैं अपने महबूब से मिलना कैसे छोड़ सकता हूँ, जबकि उसकी दिलकश अदाएँ और आकर्षण मेरा सारा आत्म-नियंत्रण छीन लेते हैं।
5
ऐ 'वली' आब उस परी-रू की
मुझ सिने का ग़ुबार खोती है
ऐ वली, उस परी जैसे चेहरे वाले महबूब की चमक मेरे सीने के ग़म और मैल को साफ़ कर देती है।
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