अहल-ए-ज़ाहिर जिस क़दर चाहें करें बहस-ओ-जिदाल मैं ये समझा हूँ ख़ुदी में तो ख़ुदा मिलता नहीं

“Let the formalists dispute and debate as much as they will; I have come to realize that within the ego, God is never found.”

— अकबर इलाहाबादी
अर्थ

दिखावे और बाहरी बातों में उलझे लोग चाहे जितनी बहस कर लें, मैंने तो यही समझा है कि अहंकार या ख़ुदी में ईश्वर नहीं मिलता।

विस्तार

शायर यहाँ बड़ी सादगी से कहते हैं कि बाहरी रस्मों-रिवाजों और किताबी बहसों में उलझे लोग चाहे जितने तर्क-वितर्क कर लें, उनसे रूहानी सच हासिल नहीं होता। ईश्वर को पाने का रास्ता दिमागी दांव-पेंच में नहीं, बल्कि अपने अहंकार को मिटाने में छुपा है। जब तक दिल में 'ख़ुदी' यानी 'मैं' का पर्दा तना रहेगा, तब तक उस परवरदिगार का दीदार मुमकिन नहीं हो सकता।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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