उम्मीद-ए-चश्म-ए-मुरव्वत कहाँ रही बाक़ी ज़रीया बातों का जब सिर्फ़ टेलीफ़ोन हुआ

“What hope remains for a gaze of tenderness and grace, when the telephone has become the sole medium of our speech?”

— अकबर इलाहाबादी
अर्थ

जब बातचीत का एकमात्र माध्यम सिर्फ़ टेलीफ़ोन बन गया, तो फिर किसी की आँखों में मुरव्वत और अपनापन देखने की उम्मीद कहाँ बाक़ी रह सकती है।

विस्तार

शायर बड़े ही मार्मिक अंदाज़ में कहते हैं कि जब बातचीत का ज़रिया सिर्फ़ टेलीफ़ोन बन गया, तो आँखों की वह मुरव्वत, लिहाज़ और अपनापन कहीं खो गया। मशीनी दूरियों ने आवाज़ तो पहुँचा दी, लेकिन आमने-सामने बैठकर आँखों ही आँखों में महसूस होने वाली हमदर्दी छीन ली। यह शेर बतलाता है कि बिना दीदार और रूबरू हुए कोई भी राब्ता रूहानी तौर पर मुकम्मल नहीं हो सकता।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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