ग़ज़ल

जहाँ में हाल मिरा इस क़दर ज़बून हुआ

جہاں میں حال مرا اس قدر زبون ہوا
अकबर इलाहाबादी· Ghazal· 5 shers· radif: हुआ

यह ग़ज़ल अत्यधिक पीड़ा, निराशा और भाग्य के आघात से टूटी हुई इच्छाओं का मार्मिक चित्रण करती है। इसमें शायर अपनी बेबसी और दुख की उस पराकाष्ठा को व्यक्त करता है जहाँ उसकी बदहाली देखकर तड़पते हुए ज़ख़्मी को भी तसल्ली मिल जाती है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
जहाँ में हाल मिरा इस क़दर ज़बून हुआ कि मुझ को देख के बिस्मिल को भी सुकून हुआ
दुनिया में मेरी हालत इस कदर दयनीय और खराब हो गई कि मुझे देखकर तड़पते हुए घायल शिकार को भी सुकून मिल गया।
2
ग़रीब दिल ने बहुत आरज़ूएँ पैदा कीं मगर नसीब का लिक्खा कि सब का ख़ून हुआ
इस लाचार दिल ने बहुत-सी ख्वाहिशें पैदा की थीं, लेकिन किस्मत का लिखा ऐसा था कि उन सभी की हत्या हो गई यानी वे सब अधूरी रह गईं।
3
वो अपने हुस्न से वाक़िफ़ मैं अपनी अक़्ल से सैर उन्हों ने होश सँभाला मुझे जुनून हुआ
वह अपनी सुंदरता से परिचित हो गईं और मैं अपनी अक़्ल से बेज़ार हो गया; जैसे ही उन्होंने होश सँभाला, मुझ पर दीवानगी सवार हो गई।
4
उम्मीद-ए-चश्म-ए-मुरव्वत कहाँ रही बाक़ी ज़रीया बातों का जब सिर्फ़ टेलीफ़ोन हुआ
जब बातचीत का एकमात्र माध्यम सिर्फ़ टेलीफ़ोन बन गया, तो फिर किसी की आँखों में मुरव्वत और अपनापन देखने की उम्मीद कहाँ बाक़ी रह सकती है।
5
निगाह-ए-गर्म क्रिसमस में भी रही हम पर हमारे हक़ में दिसम्बर भी माह-ए-जून हुआ
क्रिसमस के सर्द मौसम में भी मुझ पर उनकी निगाह की गर्माहट बनी रही, जिससे मेरे लिए दिसंबर का महीना भी जून जैसी तपिश में बदल गया।
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