इश्क़ से है मुजतनिब ज़ाहिद अबस शेर को सैद-ए-ज़बूँ से क्या ग़रज़

“The pious ascetic flees from love in vain; what concern has the lion with such feeble prey?”

— अल्ताफ़ हुसैन हाली
अर्थ

ज़ाहिद (तपस्वी) बेकार ही इश्क़ से बचता फिरता है, क्योंकि शेर को किसी कमज़ोर शिकार से क्या मतलब हो सकता है।

विस्तार

यहाँ शायर ज़ाहिद (दिखावे के तपस्वी) पर बड़ी ख़ूबसूरत चुटकी लेते हैं, जो इस घमंड में इश्क़ से बचता फिरता है कि कहीं इश्क़ उसे अपना शिकार न बना ले। शायर कहते हैं कि उसका यह डर बिल्कुल फ़िज़ूल है, क्योंकि इश्क़ तो जंगल के उस शेर जैसा है जो सिर्फ़ दिलेर और जाँबाज़ रूहों का शिकार करता है। भला शेर को ऐसे कमज़ोर और बेदम शिकार से क्या सरोकार? इश्क़ की आग में तपने के लिए जिस हिम्मत की ज़रूरत होती है, वह इस ज़ाहिद के बस की बात नहीं।

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