“When Jacob's home was flourishing with Joseph's living grace, the heavens asked, 'Whose house of sorrow is this place?'”
जब यूसुफ़ की मौजूदगी से याक़ूब का घर आबाद और खुशहाल था, तब आसमान पूछता था कि यह ग़म का घर (बैत-ए-हुज़न) किसका है।
यह शेर हज़रत यूसुफ़ और उनके पिता हज़रत याक़ूब के असीम प्रेम और जुदाई के मशहूर क़िस्से से जुड़ा है। शायर कहता है कि जब यूसुफ़ की मौजूदगी से घर खुशियों से पूरी तरह आबाद था, तभी से आसमान (क़िस्मत) को आने वाली तबाही की भनक थी और उसने उसे 'बैत-ए-हुज़न' यानी ग़म का घर पुकारना शुरू कर दिया था। यह ज़िंदगी की उस गहरी सच्चाई को बयान करता है जहाँ हमारी सबसे बड़ी ख़ुशियों के दामन में भी आने वाले विरह का साया पहले से छुपा होता है।
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