“Far deeper than on other days is your absorption today; whom do you now resolve to captivate, O pious elder of our age?”
आज आपका ध्यान और लीनता बाकी दिनों से कहीं अधिक है; ऐ ज़माने के बुज़ुर्ग, अब आप किसे अपने वश में करने या जीतने का इरादा रखते हैं?
इस शेर में शायर अपने दौर के धर्मगुरु यानी शेख़ साहब पर बहुत ही मीठा और चुटीला तंज़ कसते हैं। वे देखते हैं कि शेख़ आज रोज़ाना के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा गहरी समाधि और ध्यान में डूबे बैठे हैं। शायर शरारत से पूछते हैं कि इस ख़ास इबादत के पीछे आख़िर किसका दिल जीतने या किसे अपने वश में करने की तैयारी चल रही है, यानी यह सादगी सच्ची बندگی है या दुनिया को रिझाने का नया ढोंग?
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