दोश पर रख़्त-ए-सफ़र बाँधे है क्या ग़ुंचा सबा देखते हैं सब को याँ जैसे कि तय्यारी में हम

“Has the flowerbud bound its travel-pack upon its shoulder, O morning breeze? We look upon everyone here, as if poised to take our leave.”

— बहादुर शाह ज़फ़र
अर्थ

ऐ सबा, क्या कली ने अपने कंधे पर सफ़र का सामान बाँध लिया है? हम यहाँ सबको ऐसे देख रहे हैं मानो ख़ुद जाने की तय्यारी में हों।

विस्तार

मीर इस शेर में ज़िंदगी के क्षणभंगुर होने के अहसास को बड़ी नज़ाकत से बयां करते हैं। वे सुबह की हवा से पूछते हैं कि क्या यह बंद कली अपने कंधे पर सफ़र का सामान बाँधे खड़ी है, क्योंकि खिलते ही उसका बिखर जाना तय है। ठीक वैसे ही, हम इंसान भी इस महफ़िल में हर किसी को ऐसी रुख़्सत होती नज़रों से देखते हैं, मानो बस दुनिया से कूच करने की ही तैयारी में हों।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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