ग़ज़ल
मर गए ऐ वाह उन की नाज़-बरदारी में हम
مر گئے اے واہ ان کی ناز برداری میں ہم
यह ग़ज़ल इश्क़ में महबूब के नाज़-नख़रे उठाने की लाचारी और दिल की बेबसी को मार्मिक ढंग से बयां करती है। महफ़िल में शमा की तरह तिल-तिल कर जलता आशिक़ अपने आत्म-समर्पण और प्रेम के असहनीय दर्द को उजागर करता है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
मर गए ऐ वाह उन की नाज़-बरदारी में हम
दिल के हाथों से पड़े कैसी गिरफ़्तारी में हम
हम महबूब के नाज़-नख़रे उठाते-उठाते मिट गए, और अफ़सोस कि अपने ही दिल के हाथों हम कैसी अज़ीब क़ैद में पड़ गए।
2
सब पे रौशन है हमारी सोज़िश-ए-दिल बज़्म में
शम्अ साँ जलते हैं अपनी गर्म-बाज़ारी में हम
महफ़िल में मौजूद हर व्यक्ति पर हमारे दिल की जलन ज़ाहिर है; हम अपनी ही शोहरत और चर्चा के दौर में शमा की तरह जल रहे हैं।
3
याद में है तेरे दम की आमद-ओ-शुद पुर-ख़याल
बे-ख़बर सब से हैं इस दम की ख़बरदारी में हम
आपकी याद में सांसों के आने-जाने पर पूरा ध्यान लगा हुआ है, और इस सांस की निगरानी करने में हम बाकी सब चीज़ों से बेखबर हो गए हैं।
4
जब हँसाया गर्दिश-ए-गर्दूं ने हम को शक्ल-ए-गुल
मिस्ल-ए-शबनम हैं हमेशा गिर्या ओ ज़ारी में हम
जब भी किस्मत के फेर ने हमें फूल की तरह मुस्कुराने का मौका दिया, हम ओस की बूंद की तरह हमेशा रोने और आह-ओ-ज़ारी करने में ही मुब्तला रहे।
5
चश्म ओ दिल बीना है अपने रोज़ ओ शब ऐ मर्दुमाँ
गरचे सोते हैं ब-ज़ाहिर पर हैं बेदारी में हम
ऐ लोगो, रात-दिन हमारी आँखें और दिल सब कुछ देख रहे हैं; हालाँकि हम ज़ाहिर में सोते हुए लगते हैं, लेकिन असल में हम जाग रहे हैं।
6
दोश पर रख़्त-ए-सफ़र बाँधे है क्या ग़ुंचा सबा
देखते हैं सब को याँ जैसे कि तय्यारी में हम
ऐ सबा, क्या कली ने अपने कंधे पर सफ़र का सामान बाँध लिया है? हम यहाँ सबको ऐसे देख रहे हैं मानो ख़ुद जाने की तय्यारी में हों।
7
कब तलक बे-दीद से या रब रखें चश्म-ए-वफ़ा
लग रहे हैं आज कल तो दिल की ग़म-ख़्वारी में हम
हे ईश्वर, हम उस बेमुरव्वत महबूब से कब तक वफ़ा की उम्मीद रखें? इन दिनों तो हम बस अपने ही दुखी दिल को दिलासा देने और उसका ग़म बाँटने में लगे हुए हैं।
8
देख कर आईना क्या कहता है यारो अब वो शोख़
माह से सद चंद बेहतर हैं अदा-दारी में हम
हे दोस्तों! आईने में खुद को देखकर वह चंचल महबूब अब कहता है कि नाज़-ओ-अंदाज़ और अदाओं के मामले में हम चाँद से भी सौ गुना बेहतर हैं।
9
ऐ 'ज़फ़र' लिख तू ग़ज़ल बहर ओ क़वाफ़ी फेर कर
ख़ामा-ए-दुर-रेज़ से हैं अब गुहर-बारी में हम
ऐ ज़फ़र, तू बहर और क़ाफ़ियों को बदलकर ग़ज़ल लिख, क्योंकि अब हम मोती बरसाने वाले क़लम से मोतियों की बारिश करने में लगे हैं।
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