इलाही क्यूँ नहीं उठती क़यामत माजरा क्या है हमारे सामने पहलू में वो दुश्मन के बैठे हैं

“O God, why does Doomsday not arise? What mystery holds it back? / Right before my eyes, my beloved sits beside my rival.”

— दाग़ देहलवी
अर्थ

हे ईश्वर, प्रलय क्यों नहीं आ जाती, आख़िर बात क्या है? हमारे ही सामने वह हमारे दुश्मन के पहलू में बैठे हैं।

विस्तार

ज़रा सोचिए उस आशिक़ के दिल की तड़प, जिसकी नज़रों के ठीक सामने उसका महबूब उसके सबसे बड़े रक़ीब के पहलू में बैठा हो। शायर के लिए यह मंज़र किसी भयानक तबाही से कम नहीं है, इसलिए वह खुदा से शिकवा करता है कि जब उसका संसार उजड़ चुका है, तो फिर कायनात की क़यामत आने में क्या देर है? यहाँ प्रेमी का निजी दर्द इतना गहरा है कि वह पूरे ब्रह्मांड के फ़ना हो जाने की उम्मीद करता है।

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