ग़ज़ल
भवें तनती हैं ख़ंजर हाथ में है तन के बैठे हैं
بھویں تنتی ہیں خنجر ہاتھ میں ہے تن کے بیٹھے ہیں
इस ग़ज़ल में महबूब के तीखे तेवरों, नाज़-ओ-अंदाज़ और उनके दिलकश ग़ुस्से का सजीव चित्रण किया गया है। शायर महबूब के यौवन, बाँकपन और उनकी कातिलाना चितवन से दिलों पर पड़ने वाले गहरे असर को बेहद खूबसूरती से बयाँ करता है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
भवें तनती हैं ख़ंजर हाथ में है तन के बैठे हैं
किसी से आज बिगड़ी है कि वो यूँ बन के बैठे हैं
उनकी भौंहें तनी हुई हैं, हाथ में खंजर है और वे तनकर बैठे हैं। लगता है आज किसी से उनकी अनबन हो गई है कि वे इस तरह सज-धज कर और तेवर दिखाकर बैठे हैं।
2
दिलों पर सैकड़ों सिक्के तिरे जोबन के बैठे हैं
कलेजों पर हज़ारों तीर इस चितवन के बैठे हैं
दिलों पर तुम्हारी जवानी के हुस्न के सैकड़ों सिक्के जमे हुए हैं, और सीनों पर तुम्हारी इस तिरछी नज़र के हज़ारों तीर लगे हुए हैं।
3
इलाही क्यूँ नहीं उठती क़यामत माजरा क्या है
हमारे सामने पहलू में वो दुश्मन के बैठे हैं
हे ईश्वर, प्रलय क्यों नहीं आ जाती, आख़िर बात क्या है? हमारे ही सामने वह हमारे दुश्मन के पहलू में बैठे हैं।
4
ये गुस्ताख़ी ये छेड़ अच्छी नहीं है ऐ दिल-ए-नादाँ
अभी फिर रूठ जाएँगे अभी तो मन के बैठे हैं
ऐ नादान दिल, यह गुस्ताख़ी और छेड़छाड़ अच्छी नहीं है; वे अभी-अभी तो माने हैं और फिर से रूठ जाएँगे।
5
असर है जज़्ब-ए-उल्फ़त में तो खिंच कर आ ही जाएँगे
हमें पर्वा नहीं हम से अगर वो तन के बैठे हैं
अगर प्रेम के आकर्षण में असर है तो वह खिंचकर आ ही जाएंगे, हमें कोई परवाह नहीं यदि वे हमसे अकड़कर या रूठकर बैठे हैं।
6
सुबुक हो जाएँगे गर जाएँगे वो बज़्म-ए-दुश्मन में
कि जब तक घर में बैठे हैं वो लाखों मन के बैठे हैं
अगर वे दुश्मन की महफ़िल में जाएँगे तो हल्के हो जाएँगे और उनका मान घट जाएगा, जबकि जब तक वे अपने घर में बैठे हैं उनका वज़न और रुतबा लाखों मन का है।
7
फ़ुसूँ है या दुआ है या मुअ'म्मा खुल नहीं सकता
वो कुछ पढ़ते हुए आगे मिरे मदफ़न के बैठे हैं
यह समझ में नहीं आ रहा कि यह कोई जादू है, दुआ है या कोई पहेली; वे मेरी क़ब्र के सामने बैठकर कुछ पढ़ रहे हैं।
8
बहुत रोया हूँ मैं जब से ये मैं ने ख़्वाब देखा है
कि आप आँसू बहाते सामने दुश्मन के बैठे हैं
जब से मैंने यह सपना देखा है कि आप दुश्मन के सामने बैठकर आँसू बहा रहे हैं, तब से मैं बहुत रोया हूँ।
9
खड़े हों ज़ेर-ए-तूबा वो न दम लेने को दम भर भी
जो हसरत-मंद तेरे साया-ए-दामन के बैठे हैं
जो लोग आपके दामन के साये की हसरत लिए बैठे हैं, वे जन्नत के तूबा दरख़्त के नीचे एक पल भी ठहरने या आराम करने के लिए खड़े नहीं होंगे।
10
तलाश-ए-मंज़िल-ए-मक़्सद की गर्दिश उठ नहीं सकती
कमर खोले हुए रस्ते में हम रहज़न के बैठे हैं
मंज़िल की तलाश में भटकने की परेशानियाँ अब हमसे बर्दाश्त नहीं होतीं, इसलिए हम थक-हारकर लुटेरे के ही रास्ते में बैठ गए हैं।
11
ये जोश-ए-गिर्या तो देखो कि जब फ़ुर्क़त में रोया हूँ
दर ओ दीवार इक पल में मिरे मदफ़न के बैठे हैं
मेरे रोने की तीव्रता तो देखिए कि जब भी मैं जुदाई के दर्द में रोया हूँ, एक ही पल में मेरी क़ब्र के दरवाज़े और दीवारें ढह गए हैं।
12
निगाह-ए-शोख़ ओ चश्म-ए-शौक़ में दर-पर्दा छनती है
कि वो चिलमन में हैं नज़दीक हम चिलमन के बैठे हैं
महबूब की शोख़ नज़र और आशिक़ की मुश्ताक़ निगाहें पर्दे की ओट से छनकर आपस में मिल रही हैं, क्योंकि वो चिलमन के अंदर क़रीब हैं और हम चिलमन के बाहर पास ही बैठे हैं।
13
ये उठना बैठना महफ़िल में उन का रंग लाएगा
क़यामत बन के उट्ठेंगे भबूका बन के बैठे हैं
महफ़िल में उनका यह आना-जाना और उठना-बैठना ज़रूर कोई बड़ा असर दिखाएगा। वे इस समय दहकते अंगारे की तरह बैठे हैं और जब उठेंगे तो क़यामत ढा देंगे।
14
किसी की शामत आएगी किसी की जान जाएगी
किसी की ताक में वो बाम पर बन-ठन के बैठे हैं
किसी की शामत आने वाली है और किसी की जान जाने वाली है, क्योंकि वे किसी के इंतज़ार में छत पर खूब सज-संवर कर बैठे हैं।
15
क़सम दे कर उन्हें ये पूछ लो तुम रंग-ढंग उस के
तुम्हारी बज़्म में कुछ दोस्त भी दुश्मन के बैठे हैं
उन्हें क़सम देकर उसके तौर-तरीक़ों के बारे में पूछ लो, क्योंकि तुम्हारी महफ़िल में दुश्मन के कुछ दोस्त भी बैठे हुए हैं।
16
कोई छींटा पड़े तो 'दाग़' कलकत्ते चले जाएँ
अज़ीमाबाद में हम मुंतज़िर सावन के बैठे हैं
अगर बारिश का एक छींटा भी पड़ जाए तो 'दाग़' कलकत्ते चले जाएँ, जबकि हम यहाँ अज़ीमाबाद में सावन के महीने का इंतज़ार करते हुए बैठे हैं।
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