सुबुक हो जाएँगे गर जाएँगे वो बज़्म-ए-दुश्मन में कि जब तक घर में बैठे हैं वो लाखों मन के बैठे हैं

“They will lose all their weight should they attend the rival's feast; / As long as they remain at home, a hundred thousand maunds they weigh.”

— दाग़ देहलवी
अर्थ

अगर वे दुश्मन की महफ़िल में जाएँगे तो हल्के हो जाएँगे और उनका मान घट जाएगा, जबकि जब तक वे अपने घर में बैठे हैं उनका वज़न और रुतबा लाखों मन का है।

विस्तार

इस शेर में शायर इज़्ज़त और खुददारी को 'वज़न' के खूबसूरत रूपक से समझा रहे हैं। जब तक इंसान या महबूब अपनी हद में, अपने घर में रहता है, उसका वक़ार और रुतबा लाखों मन भारी महसूस होता है। मगर जैसे ही वह गै़रों या दुश्मनों की महफ़िल में हाजिरी देता है, उसका वह सारा मान-सम्मान हल्का पड़ जाता है और कद्र घट जाती है। यह एक बड़ी सादा सी नसीहत है कि अपनी गरिमा बनाए रखने के लिए हर किसी की महफ़िल की रौनक नहीं बनना चाहिए।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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