ग़म क़यामत का नहीं वाइ'ज़ मुझे ये फ़िक्र है दीन कब बाक़ी रहा दुनिया अगर फ़ानी हुई

“O preacher, it is not the dread of Judgment Day that troubles me; my worry is: how shall faith endure once this mortal world ceases to be?”

— दाग़ देहलवी
अर्थ

हे उपदेशक, मुझे प्रलय के दिन का दुःख नहीं है, बल्कि यह चिंता है कि यदि यह संसार ही नश्वर है, तो धर्म कैसे शेष रह सकता है?

विस्तार

शायर यहाँ उपदेशक (वाइज़) की कयामत वाली चेतावनियों पर एक चुटीला और गहरा सवाल उठाता है। वह कहता है कि मुझे दुनिया के मिट जाने या हिसाब-किताब का खौफ़ नहीं, बल्कि चिंता यह है कि अगर यह नश्वर संसार ही न रहा, तो धर्म और आस्था कहाँ टिकेंगे? दरअसल, धर्म का सारा ताना-बाना और नेकियों की आज़माइश इसी ज़िंदगानी से जुड़ी है, इसलिए दुनिया के बिना दीन की कल्पना भी अधूरी लगती है।

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