ग़ज़ल
देख कर जोबन तिरा किस किस को हैरानी हुई
دیکھ کر جوبن ترا کس کس کو حیرانی ہوئی
यह ग़ज़ल महबूब के अप्रतिम यौवन और उसकी सम्मोहक सुंदरता की प्रशंसा करती है, जिसे देखकर सारा ज़माना हैरान है। इसमें छिपे हुए प्रेम की असहनीय तड़प और उस जानलेवा कशमकश का मार्मिक चित्रण है, जो दिल के राज़ छिपाने से पैदा होती है।
Source: rekhta · HI
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1
देख कर जोबन तिरा किस किस को हैरानी हुई
इस जवानी पर जवानी आप दीवानी हुई
तुम्हारा रूप और यौवन देखकर हर कोई हैरान रह गया, और तुम्हारी इस जवानी को देखकर खुद जवानी भी तुम पर मोहित हो गई।
2
पर्दे पर्दे में मोहब्बत दुश्मन-ए-जानी हुई
ये ख़ुदा की मार क्या ऐ शौक़-ए-पिन्हानी हुई
पर्दे ही पर्दे में छिपकर मोहब्बत जान की दुश्मन बन गई है; ऐ छिपी हुई चाहत, यह हम पर ख़ुदा का कैसा क़हर या आफ़त टूट पड़ी है?
3
दिल का सौदा कर के उन से क्या पशेमानी हुई
क़द्र उस की फिर कहाँ जिस शय की अर्ज़ानी हुई
उनसे अपने दिल का सौदा करके मुझे बहुत पछतावा हुआ, क्योंकि जो चीज़ बहुत सस्ती और आम हो जाती है, फिर उसकी कोई क़द्र बाकी नहीं रहती।
4
मेरे घर उस शोख़ की दो दिन से मेहमानी हुई
बेकसी की आज कल क्या ख़ाना-वीरानी हुई
पिछले दो दिनों से वह शोख़ (चंचल प्रियतम) मेरे घर मेहमान बना हुआ है, जिसकी वजह से आजकल मेरी बेबसी और अकेलेपन का घर पूरी तरह उजड़ गया है।
5
तर्क-ए-रस्म-ओ-राह पर अफ़्सोस है दोनों तरफ़
हम से नादानी हुई या तुम से नादानी हुई
मेल-जोल और रिश्ते खत्म होने पर दोनों तरफ अफ़सोस है; न जाने यह नादानी हमसे हुई थी या तुमसे।
6
इब्तिदा से इंतिहा तक हाल उन से कह तो दूँ
फ़िक्र ये है और जो कह कर पशेमानी हुई
मैं शुरुआत से लेकर अंत तक अपना सारा हाल उनसे कह तो दूँ, मगर चिंता यह है कि कहीं कहने के बाद मुझे पछतावा न हो।
7
ग़म क़यामत का नहीं वाइ'ज़ मुझे ये फ़िक्र है
दीन कब बाक़ी रहा दुनिया अगर फ़ानी हुई
हे उपदेशक, मुझे प्रलय के दिन का दुःख नहीं है, बल्कि यह चिंता है कि यदि यह संसार ही नश्वर है, तो धर्म कैसे शेष रह सकता है?
8
तुम न शब को आओगे ये है यक़ीं आया हुआ
तुम न मानोगे मिरी ये बात है मानी हुई
मुझे पक्का यक़ीन है कि तुम रात को नहीं आओगे, और यह पहले से ही मानी हुई बात है कि तुम मेरी बात नहीं मानोगे।
9
मुझ में दम जब तक रहा मुश्किल में थे तीमारदार
मेरी आसानी से सब यारों की आसानी हुई
जब तक मुझमें जान बाकी रही, मेरी देखरेख करने वाले परेशानी में रहे। मेरी मृत्यु से जैसे ही मुझे राहत मिली, वैसे ही मेरे सभी दोस्तों की भी मुश्किलें आसान हो गईं।
10
इस को क्या कहते हैं उतना ही बढ़ा शौक़-ए-विसाल
जिस क़दर मशहूर उन की पाक-दामानी हुई
इसे क्या कहते हैं कि मिलने की चाहत उतनी ही बढ़ती गई, जिस हद तक उनकी पवित्रता और पाकदामनी की शोहरत फैली।
11
बज़्म से उठने की ग़ैरत बैठने से दिल को रश्क
देख कर ग़ैरों का मजमा क्या परेशानी हुई
महफ़िल से उठकर जाने में स्वाभिमान आहत होता है और वहाँ बैठे रहने से दिल में जलन होती है; दूसरों की उस भीड़ को देखकर मुझे कितनी भारी परेशानी और दुविधा हुई।
12
दावा-ए-तस्ख़ीर पर ये उस परी-वश ने कहा
आप का दिल क्या हुआ मोहर-ए-सुलेमानी हुई
जब मैंने उसे वश में करने का दावा किया, तो उस परी जैसी सुंदरी ने तंज़ करते हुए कहा कि क्या आपका दिल हज़रत सुलेमान की मुहर बन गया है जो सबको अपने अधीन कर लेगा?
13
खुल गईं ज़ुल्फ़ें मगर उस शोख़ मस्त-ए-नाज़ की
झूमती बाद-ए-सबा फिरती है मस्तानी हुई
शायद उस शोख़ और नाज़-नख़रे वाली महबूबा की ज़ुल्फ़ें खुल गई हैं, क्योंकि सुबह की हवा मदहोश होकर झूमती फिर रही है।
14
मैं सरापा सज्दे करता उस के दर पर शौक़ से
सर से पा तक क्यूँ न पेशानी ही पेशानी हुई
मैं बड़े शौक़ से उसके दरवाज़े पर पूरी तरह सजदा करता; काश कि मेरा पूरा शरीर सिर से पाँव तक केवल पेशानी (माथा) ही बन जाता।
15
दिल की क़ल्ब-ए-माहियत का हो उसे क्यूँकर यक़ीं
कब हवा मिट्टी हुई है आग कब पानी हुई
किसी को दिल की मूल प्रकृति या स्वभाव के बदल जाने का यक़ीन भला कैसे हो सकता है? हवा कब मिट्टी बनी है और आग कब पानी हुई है?
16
आते ही कहते हो अब घर जाएँगे अच्छी कही
ये मसल पूरी यहाँ मन-मानी घर जानी हुई
आप आते ही कह रहे हैं कि अब घर जाएँगे, यह भी खूब रही। यहाँ तो यह कहावत बिल्कुल सच साबित हो गई कि अपनी मनमानी चलाना ही अपना घर समझना है।
17
अरसा-ए-महशर में तुझ को ढूँड लाऊँ तो सही
कोई छुप सकती है जो सूरत हो पहचानी हुई
क़यामत के मैदान में बस एक बार मैं तुम्हें ढूँढ ही निकालूँ, क्योंकि भला कोई ऐसा चेहरा भी कभी छुप सकता है जो इतनी अच्छी तरह पहचाना हुआ हो?
18
देख कर क़ातिल का ख़ाली हाथ भी जी डर गया
उस की चीन-ए-आस्तीं भी चीन-ए-पेशानी हुई
क़ातिल का खाली हाथ देखकर भी मेरा दिल डर गया, और उसकी आस्तीन की सिलवट भी मुझे उसके माथे की त्यौरी जैसी लगी।
19
खा के धोका उस बुत-ए-कमसिन ने दामन में लिए
अश्क-अफ़्शानी भी मेरी गौहर-अफ़्शानी हुई
उस कमसिन महबूब ने धोखे से मेरे आँसुओं को मोती समझकर अपने दामन में समेट लिया, इस तरह मेरा आँसू बहाना भी मोती बरसाने जैसा हो गया।
20
बेकसी पर मेरी अपनी तेग़ की हसरत तो देख
चश्म-ए-जौहर भी ब-शक्ल-ए-चश्म-ए-हैरानी हुई
मेरी बेबसी पर अपनी तलवार की हसरत तो देखो, उसके फौलाद के जौहर (निशान) भी हैरानी की आँख की तरह बन गए हैं।
21
बेकसी पर 'दाग़' की अफ़्सोस आता है हमें
किस जगह किस वक़्त उस की ख़ाना-वीरानी हुई
हमें 'दाग़' की बेबसी और लाचारी पर बहुत अफ़सोस होता है; न जाने किस जगह और किस घड़ी उसका घर-बार उजड़कर बर्बाद हो गया।
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