इस तरह अहल-ए-नाज़ नाज़ करें बंदगी है कि ये ख़ुदाई है

“When the graceful flaunt such proud disdain, is this humble servitude or divinity's reign?”

— दाग़ देहलवी
अर्थ

अगर नाज़-ओ-अंदाज़ दिखाने वाले महबूब इस तरह नाज़ और ग़ुरूर करें, तो समझ नहीं आता कि यह बंदगी है या ख़ुदाई।

विस्तार

इस शेर में शायर माशूक़ के बेपरवाह नाज़-ओ-अंदाज़ और नख़रों पर प्यार भरी चुटकी ले रहा है। हुस्न वालों की अदा और ग़ुरूर इतना बेपनाह है कि आशिक़ हैरान होकर पूछ बैठता है कि ये महज़ इंसानी नज़ाकत है या फिर ख़ुदाई का रौब? महबूब की इस बेरुख़ी में भी एक ऐसा सम्मोहन है, जो आशिक़ को झुकने पर मजबूर कर देता है मानो वो किसी ख़ुदा के आगे सजदा कर रहा हो।

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