ग़ज़ल
दिल चुरा कर नज़र चुराई है
دل چرا کر نظر چرائی ہے
यह ग़ज़ल महबूब की बेरुखी और दिल चुराकर मुँह मोड़ लेने के दर्द को बयां करती है। शायर उस असहनीय विरह और बर्बादी का रोना रोता है, जो महबूब के एक बार मिलकर हमेशा के लिए बिछड़ जाने से पैदा हुई है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
दिल चुरा कर नज़र चुराई है
लुट गए लुट गए दुहाई है
आपने मेरा दिल चुरा लिया और फिर नज़रें भी फेर लीं; हम पूरी तरह लुट चुके हैं और फ़रियाद कर रहे हैं।
2
एक दिन मिल के फिर नहीं मिलते
किस क़यामत की ये जुदाई है
लोग सिर्फ़ एक दिन मिलकर फिर कभी नहीं मिलते, यह जुदाई कितनी भयानक और क़यामत जैसी है।
3
ऐ असर कर न इंतिज़ार-ए-दुआ
माँगना सख़्त बे-हयाई है
ऐ असर! तू किसी दुआ का इंतज़ार मत कर, क्योंकि हाथ फैलाना और कुछ माँगना बहुत बड़ी बेशर्मी है।
4
मैं यहाँ हूँ वहाँ है दिल मेरा
ना-रसाई अजब रसाई है
मैं यहाँ हूँ और मेरा दिल वहाँ है; यह न पहुँच पाना भी एक अजीब तरह की पहुँच है।
5
इस तरह अहल-ए-नाज़ नाज़ करें
बंदगी है कि ये ख़ुदाई है
अगर नाज़-ओ-अंदाज़ दिखाने वाले महबूब इस तरह नाज़ और ग़ुरूर करें, तो समझ नहीं आता कि यह बंदगी है या ख़ुदाई।
6
पानी पी पी के तौबा करता हूँ
पारसाई सी पारसाई है
मैं बार-बार पानी पीकर तौबा करता हूँ; मेरी यह परहेज़गारी और पवित्रता भी क्या ख़ूब है!
7
वा'दा करने का इख़्तियार रहा
बात करने में क्या बुराई है
वादा करना या न करना तो आपके अपने अधिकार में है, इसलिए केवल बात कर लेने में क्या बुराई है?
8
कब निकलता है अब जिगर से तीर
ये भी क्या तेरी आश्नाई है
अब जिगर से तीर बाहर निकलता ही नहीं है; यह तुम्हारी कैसी पहचान या मोहब्बत है?
9
'दाग़' उन से दिमाग़ करते हैं
नहीं मालूम क्या समाई है
'दाग़' अपनी महबूबा के सामने भी नख़रे और ग़ुरूर दिखाते हैं; न जाने उनके दिमाग़ में क्या बात समा गई है।
Comments · 0
Free — just your email. You'll come right back here.
No comments yet. Be the first.
