“Hear my reproach and meet my gaze, O cruel one; why must you be overcome with such remorse?”
ऐ ज़ालिम, नज़रें मिलाकर मेरी शिकायत सुन; तू इस तरह शर्मिंदा और पछतावे से भरा क्यों हुआ जा रहा है?
इस शेर में आशिक़ अपने माशूक़ से बड़ी नज़ाकत और शिकवे भरे अंदाज़ में कह रहा है कि मेरी बात सुनते हुए नज़रें मत चुराओ, ज़रा आँखें तो मिलाओ। 'ज़ालिम' कहने में तंज़ कम और प्यार ज़्यादा है, क्योंकि जैसे ही नज़रें मिलती हैं, महबूब की सारी बेरुख़ी शर्मिंदगी और पछतावे में बदल जाती है। यह शेर मुहब्बत के उस नाज़ुक एहसास को छूता है जहाँ शिकवा दूरियाँ बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि महबूब के दिल में छुपे दर्द और मोहब्बत को देखने के लिए किया जाता है।
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