“On the night of the promised meeting, at times I lay in a faint; and at times, lifting my head, I strained to see.”
मुलाक़ात के वादे की रात, कभी तो मैं इंतज़ार में बेहोश पड़ा रहा और कभी गर्दन उठाकर देखने लगा कि महबूब आया या नहीं।
यह शेर मिलन की उस रात के इंतज़ार और बेताबी को बयां करता है, जब महबूब के आने का वादा था। आशिक़ की हालत इतनी नाज़ुक और जज़्बाती है कि वह कभी तो घबराहट और दीवानगी में बेहोश हो जाता है, और कभी ज़रा-सी आहट पर उम्मीद बांधे गर्दन उठाकर दरवाज़े की तरफ़ देख लेता है। यह उम्मीद और बेचैनी के उस नाज़ुक लम्हे की खूबसूरत तस्वीर है जहाँ हर लम्हा दिल और धड़कनों का इम्तिहान लेता है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
ऑडियो
Free — just your email. You'll come right back here.
No comments yet. Be the first.
