सोज़-ए-दरूँ से अपने शरर बन गए हैं अश्क क्यूँ आह-ए-सर्द को न पतिंगे लगाएँ हम

“From the burning fire within, my tears have turned to sparks; why then should we not set our cold sighs ablaze?”

— दाग़ देहलवी
अर्थ

दिल की अंदरूनी जलन की वजह से मेरे आँसू चिंगारियाँ बन गए हैं, तो फिर हम अपनी ठंडी आहों को इन चिंगारियों से क्यों न सुलगा लें?

विस्तार

शायर यहाँ दिल के दर्द की इंतहा को एक अनोखे अंदाज़ में बयां कर रहे हैं—अंदर की तपन इतनी तेज़ है कि आँसू भी पानी न रहकर आग की चिंगारियाँ बन चुके हैं। जब रोने से भी आग ही बरस रही है, तो शायर कहता है कि फिर हम अपनी सर्द आहों को भी इसी आग से सुलगा क्यों न दें! यह शेर ग़म की उस शिद्दत को दिखाता है जहाँ मायूसी और तड़प मिलकर वजूद को भीतर से पूरी तरह भस्म कर देना चाहती हैं।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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