ग़ज़ल
ग़म से कहीं नजात मिले चैन पाएँ हम
غم سے کہیں نجات ملے چین پائیں ہم
यह ग़ज़ल निरंतर ग़म से मुक्ति और महबूब के मिलन की गहरी तड़प को दर्शाती है। शायर स्वर्ग और नर्क के भेद से परे जाकर, हर प्रकार के दर्द और पीड़ा को सहते हुए भी केवल अपने प्रियतम को पाने की प्रबल इच्छा व्यक्त करता है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
ग़म से कहीं नजात मिले चैन पाएँ हम
दिल ख़ून में नहाए तो गंगा नहाएँ हम
काश हमें दुखों से छुटकारा मिले और हम चैन पा सकें; जब दिल ख़ून में नहा लेगा, तभी हम गंगा में स्नान करेंगे।
2
जन्नत में जाएँ हम कि जहन्नम में जाएँ हम
मिल जाए तो कहीं न कहीं तुझ को पाएँ हम
चाहे हम जन्नत में जाएँ या दोज़ख़ में, बस हमारी यही इच्छा है कि कहीं न कहीं हम तुम्हें पा लें।
3
जौफ़-ए-फ़लक में ख़ाक भी लज़्ज़त नहीं रही
जी चाहता है तेरी जफ़ाएँ उठाएँ हम
आसमान के इस ख़ालीपन में अब ज़रा भी मज़ा नहीं रहा, दिल चाहता है कि हम फिर से तुम्हारे ज़ुल्म-ओ-सितम बर्दाश्त करें।
4
डर है न भूल जाए वो सफ़्फ़ाक रोज़-ए-हश्र
दुनिया में लिखते जाते हैं अपनी ख़ताएँ हम
हमें डर है कि वह ज़ालिम क़यामत के दिन भूल न जाए, इसलिए हम दुनिया में ही अपनी ख़ताएँ लिखते जा रहे हैं।
5
मुमकिन है ये कि वादे पर अपने वो आ भी जाए
मुश्किल ये है कि आप में उस वक़्त आएँ हम
यह मुमकिन है कि महबूब अपने वादे के मुताबिक आ भी जाए, लेकिन मुश्किल यह है कि उस वक्त हम अपने होश-ओ-हवास में होंगे या नहीं।
6
नाराज़ हो ख़ुदा तो करें बंदगी से ख़ुश
माशूक़ रूठ जाए तो क्यूँकर मनाएँ हम
यदि ईश्वर नाराज़ हो जाए तो उसे इबादत और प्रार्थना से मनाया जा सकता है, लेकिन अगर महबूब रूठ जाए तो उसे भला कैसे मनाएँ?
7
सर दोस्तों का काट के रखते हैं सामने
ग़ैरों से पूछते हैं क़सम किस की खाएँ हम
वे दोस्तों का सिर काटकर सामने रख देते हैं और फिर ग़ैरों से पूछते हैं कि हम किसकी क़सम खाएँ।
8
कितना तिरा मिज़ाज ख़ुशामद-पसंद है
कब तक करें ख़ुदा के लिए इल्तिजाएँ हम
आपका स्वभाव चापलूसी कितना पसंद करता है; ईश्वर के लिए हम कब तक आपसे मिन्नतें और गुज़ारिशें करते रहें?
9
लालच अबस है दिल का तुम्हें वक़्त-ए-वापसीं
ये माल वो नहीं कि जिसे छोड़ जाएँ हम
अंतिम समय में तुम्हें मेरे दिल का लालच करना व्यर्थ है; यह ऐसी दौलत नहीं है जिसे हम जाते वक्त पीछे छोड़ जाएँ।
10
सौंपा तुम्हें ख़ुदा को चले हम तो ना-मुराद
कुछ पढ़ के बख़्शना जो कभी याद आएँ हम
हम आपको ईश्वर के हवाले करके अपनी अधूरी इच्छाओं के साथ जा रहे हैं; अगर कभी हमारी याद आए, तो हमारी मग़फ़िरत के लिए कोई दुआ पढ़ देना।
11
सोज़-ए-दरूँ से अपने शरर बन गए हैं अश्क
क्यूँ आह-ए-सर्द को न पतिंगे लगाएँ हम
दिल की अंदरूनी जलन की वजह से मेरे आँसू चिंगारियाँ बन गए हैं, तो फिर हम अपनी ठंडी आहों को इन चिंगारियों से क्यों न सुलगा लें?
12
ये जान तुम न लोगे अगर आप जाएगी
उस बेवफ़ा की ख़ैर कहाँ तक मनाएँ हम
अगर तुम यह जान नहीं लोगे तो यह अपने आप ही चली जाएगी; भला हम उस बेवफ़ा की सलामती की दुआ कब तक माँगते रहें?
13
हम-साए जागते रहे नालों से रात भर
सोए हुए नसीब को क्यूँकर जगाएँ हम
हमारी आहों और रोने की आवाज़ से पड़ोसी रात भर जागते रहे, लेकिन हम अपनी सोई हुई क़िस्मत को कैसे जगाएँ?
14
जल्वा दिखा रहा है वो आईना-ए-जमाल
आती है हम को शर्म कि क्या मुँह दिखाएँ हम
वह सौंदर्य का दर्पण (प्रियतम) अपना जलवा दिखा रहा है, और हमें इतनी शर्मिंदगी महसूस हो रही है कि हम उसे अपना क्या मुँह दिखाएँ।
15
मानो कहा जफ़ा न करो तुम वफ़ा के बा'द
ऐसा न हो कि फेर लें उल्टी दुआएँ हम
मेरी बात मानो और वफ़ादारी दिखाने के बाद ज़ुल्म मत करो, कहीं ऐसा न हो कि हम दुआएँ देने के बजाय तुम्हें बद्दुआएँ देने लगें।
16
दुश्मन से मिलते जुलते हैं ख़ातिर से दोस्ती
क्या फ़ाएदा जो दोस्त को दुश्मन बनाएँ हम
हम दोस्ती की ख़ातिर ही दुश्मन से मिलते-जुलते हैं, फिर ऐसा करने का क्या फ़ायदा अगर हम अपने ही दोस्त को दुश्मन बना लें।
17
तू भूलने की चीज़ नहीं ख़ूब याद रख
ऐ 'दाग़' किस तरह तुझे दिल से भुलाएँ हम
यह बात अच्छी तरह याद रखो कि तुम भूलने की चीज़ नहीं हो। ऐ 'दाग़', हम तुम्हें अपने दिल से कैसे भुला सकते हैं?
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